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आयुक्त, सीईओ और मुख्य अभियंता तक परिषद या पंचायत विभाग से नहीं
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प्रतिनियुक्ति, संविदा और आउटसोर्स के भरोसे चल रही मप्र की मनरेगा परिषद
भोपाल। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों को रोजगार की गारंटी देने के उद्देश्य से संचालित केन्द्र सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना के संचालन के लिए गठित मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद के मुख्यालय में स्वयं की नियुक्ति वाले अथवा पंचायत विभाग के एक भी अधिकारी-कर्मचारी नहीं है। परिषद पूरी तरह प्रति-नियुक्ति, संविदा और आउटसोर्स के भरोसे चल रही है। यहां सबसे बड़े आयुक्त औ अति. मुख्य कार्यपालन अधिकारी तथा मुख्य अभियंता जैसे पदों से लेकर सबसे छोटे पदों डाक वाहक, सुरक्षा गार्ड और भृत्य तक प्रतिनियुक्ति, संविदा और आउटसोर्स पर हैं।
मुख्यालय में कुल 207 पद, सभी बाहरी
मप्र रोजगार गारंटी परिषद मुख्यालय में आयुक्त से लेकर भृत्य तक कुल 207 पद स्वीकृत हैं। विभागीय प्रतिवेदन के अनुसार 2022 की स्थिति में यहां प्रतिनियुक्ति से 9 पद, संविदा अथवा आउटसोर्स से 47 पद भरे थे, जबकि 151 पद रिक्त थे। हालांकि रिक्त पदों की संख्या अब और भी अधिक बताई जा रही है। खास बात यह है कि इनमें आयुक्त, अति. मुख्य कार्यपालन अधिकारी, मुख्य अभियंता, संयुक्त आयुक्त (निगरानी), संचालक जन शिकायत निवारण प्रकोष्ठ, संयुक्त संचालक (वित्त लेखा), उपायुक्त और उपायुक्त (लेखा), अधीक्षण यंत्री और कार्यपालन यंत्री जैसे सभी पद प्रतिनियुक्ति अथवा संविदा से भरे हैं। इसके अलावा व्यवस्था से जुड़े अन्य अधिकारी कर्मचारी भी संविदा या प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। वहीं डाक वाहक, सुरक्षा गार्ड और भृत्य जैसे पदों पर आउटसोर्स की सेवाएं ली गई हैं। इसी तरह मनरेगा के संचालन एवं क्रियान्वयन हेतु प्रदेश के संभाग, जिला, जनपद पंचायत और ग्राम पंचायत में भी स्वीकृत 28412 स्वीकृत अधिकारी-कर्मचारियों के पदों पर भी नियुक्ति संविदा और प्रतिनियुक्ति से ही की गई हैं। 31 मार्च 2022 की स्थिति में मैदानी स्तर पर भी 5634 पद रिक्त थे।
नियुक्ति स्थायी नहीं, इसलिए बेखौफ अधिकारी-कर्मचारी
मप्र में मनरेगा योजना में गड़बड़ी, घोटाले और आर्थिक अनियमितता लगातार सामने आती रही है। श्रमिकों की जगह मशीनों से काम होते हैं। अज्ञात, अपात्र, नाबालिग और मृतकों को मनरेगा हितग्राही बताकर फर्जी भुगतान होते रहे हैं। यही नहीं कई गांव में कुल मतदाता संख्या से दोगुना से अधिक मजदूर बताकर फर्जी भुगतान कर दिए गए। ऐसे मामलों में शिकायत होने पर अथवा गड़बड़ी उजागर होने पर कार्रवाई सिर्फ ठेकेदार, कर्मचारी अथवा स्थानीय अधिकारियों तक सिमटकर रह जाती है, जबकि गड़बड़ी कराए जाने की संभावना और निजी अपेक्षाएं प्रदेश, संभाग और जिला स्तर से अधिक देखी गई हैं। हर साल गड़बडिय़ां सामने आती हैं, जांच होती है, कहीं गड़बडिय़ां उजागर होती हैं, कहीं दबा दी जाती हैं। कार्रवाई होती भी है तो स्थानीय स्तर पर, शायद इसलिए क्योंकि यहां हर कोई प्रतिनियुक्ति, संविदा और आउटसोर्स पर काम कर रहा है, जिसे नौकरी से ज्यादा कमाने की चाह होती है।
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