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संघ के सामाजिक समरसता के प्रयासों से प्रभावित थे डॉ. अंबेडकर, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डॉ. अंबेडकर’ विषय पर आयोजित हुआ विशेष व्याख्यान

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 भोपाल।सामाजिक समरसता के अग्रदूत डॉ. भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सामाजिक समरसता की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से प्रभावित थे, लेकिन वे संघ कार्य की गति से संतुष्ट नहीं थे। संघ के वर्गों और आयोजनों में अचानक पहुंचकर उन्होंने वर्ग में शामिल स्वयंसेवकों की जाति और वर्ग भी पूछा और वे संतुष्ट हुए थे कि संघ सामाजिक समरसता की दिशा में काम कर रहा है। डॉ. अंबेडकर की जयंती पर विश्व संवाद केंद्र द्वारा ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डॉ. अंबेडकर’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक (मध्यभारत प्रांत) डॉ. अशोक पाण्डेय ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए कही। 

श्री पाण्डेय ने कहा कि गुण-आचरण के आधार पर समाज ने व्यक्ति को सम्मान दिया है, न कि धन-संपदा या वैभव के आधार पर। इसीलिए हमारे पुराणों में शबरी की पूजा हुई है, रावण की नहीं। उन्होंने कहा कि 1963 में स्वयं डॉ. अंबेडकर ने इस बात को स्वीकारा कि उन्होंने कर्मभूमि के रूप में नागपुर को इसलिए नहीं चुना कि वहां संघ की सबसे बड़ी टोली है, बल्कि इसलिए कि वहां धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण काम हुए हैं। मतांतकरण को लेकर उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन्होंने समाज के एक वर्ग से भेदभाव-अत्याचार के कारण लिया। 

पारसी,इस्लाम, ईसाई को छोड़ सभी हिन्दू 

श्री पाण्डे ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि पारसी, इस्लाम, ईसाई को छोडक़र देश में सभी हिन्दू हैं। उन्होंने 27 साल तक इंतजार किया। इसके बाद विवश होकर मतांतरण किया। वे देश, संस्कृति और समाज कल्याण के लिए पूरी जिंदगी लगे रहे। उन्होंने साम्यवाद और इस्लाम से समाज को दूर करने में पूरा जीवन लगाया। 

बाबा साहब के सपने को पूरा कर रहा संघ

श्री पाण्डेय ने कहा कि संघ और बाबा साहब ने सामाजिक समरसता का संदेश दिया, दोनों एक लक्ष्य, एक गंतव्य के राही रहे। वे कहते थे कि हम सभी एक जाति के हो जाएं तो देश, हिन्दू समाज का बड़ा कल्याण हो जाए। 

बाबा साहब ने भारतीय संस्कृति केन्द्रित रखा संविधान: बरतुनिया

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. अंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ के पूर्व कुलपति प्रकाश बरतुनिया ने कहा कि लोग डॉ. अंबेडकर को एक खांचे में देखते हैं कि वे वंचित समाज के नेता थे, ऐसा नहीं था। उन्होंने संविधान लिखा तो दुनिया के संविधानों के साथ हिन्दू पुराणों, वेदों, धार्मिक ग्रंथों का भी अध्ययन किया और  भारत की संस्कृति, परंपरा बनी रहे, संविधान में इस बात का ध्यान रखा।संविधान को हमारी संस्कृति पर केन्द्रित रखा। उन्होंने कहा कि बाबा साहब के जीवन के कई पहलू सामने आए ही नहीं, आरक्षण और उसकी मांग तो बाबा साहब के जन्म के बहुत पहले से रही है। उन्होंने कहा कि डॉ.अम्बेडकर की धर्म और राष्ट्र को लेकर कल्पना स्पष्ट थी। दत्तापंत ठेंगड़ीजी से उनके विचार मिलते थे। गांधी जी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया तो बाबा साहब ने तत्कालीन सरकार को प्रतिबंध हटवाने की सलाह दी थी। गुरूजी गोलवलकर ने इसके लिए उन्हें धन्यवाद भी दिया था। भाषायी समरसता को लेकर श्री बरतुनिया ने कहा कि वे सस्कृत के विद्वान थे। उन्हें कई भाषाएं आती थीं। वे चाहते थे कि राजभाषा संस्कृत बने, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी। तब हिन्दी का प्रस्ताव भी उन्होंने ही रखा। उन्होंने कहा कि समरसता के माध्यम से संघ बाबा साहब के सपने को पूरा कर रहा है। कल्पना करें कि बाबा साहब ने इस्लाम को स्वीकार किया होता तो इस देश का चित्र क्या होता? 

विसं केन्द्र न्यास के अध्यक्ष  के अध्यक्ष लाजपत आहूजा ने कहा कि समाज को तोडऩे वाले यह झूठ परोसते रहे हैं कि आर्य बाहर से आए थे, लेकिन एक मातृ डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि आर्य कहीं से नहीं आए, वे यहीं के थे। वे भारतीय संस्कृति की मूल जड़ों से जुड़े थे। कार्यक्रम की प्रस्तावना लोकेन्द्र सिंह ने रखी। आभार प्रदर्शन वि.सं. केन्द्र न्यास के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मेन्द्र महेश्वारी ने एवं संचालन सृष्टि झा ने किया।