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सनातन से अलग नहीं है जनजातीय संस्कृति
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-जनजाति सुरक्षा मंच की संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा जरूरी है जनजातीयों की ज्ञान परंपरा का संरक्षण
भोपाल। सनातन संस्कृति से जनजातीय संस्कृति अलग नहीं है। यह एक-दूसरे में निबद्ध हैं। यह कहना है पूर्व आईएएस श्याम सिंह कुमरे का। वह जनजाति सुरक्षा मंच की संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। यह कार्यक्रम वनवासी कल्याण परिषद एकलव्य संकुल में पूर्व सांसद गुमान सिंह डामोर के मुख्यआतिथ्य में आयोजित किया गया था। पूर्व स्वास्थ्य संचालक डॉ अनसुइया परस्ते और हमीदिया अस्पताल के डॉ सुरेश उइके यहां विशिष्ट अतिथ के रूप में मौजूद थे।
यहां अपनी बात रखते हुए श्री कुमरे ने जनजातीय समुदाय के स्व को समझाते हुए कहा कि इस देश की संस्कृति जनजातीय संस्कृति है और यह सनातन से अलग नहीं है। इस समाज के लोगों को भ्रमित करने के लिये कतिपय समुदायों द्वारा मूल निवासी, जनजाति व आदिवासी संबोधन के माध्यम से बांटने का प्रयास किया जाता है। जबकि व्यापार के बहाने धर्मांतरण के लिये यहां आए अंग्रेजों द्वारा विभाजन की दृष्टि से यह कार्य शुरू किया गया था। उन्होंने कहा कि 1871 में क्रिमिनल आदिवासी जैसे एक्टों के माध्यम से देश की जनता के बीच अंग्रेज यह यह धारणा बनाने में सफल रहे कि जनजातीय समाज अपराधी है और कुछ नहीं जनता है। इस दौरान अन्य वक्ताओं ने जनजातियों की हजारों वर्षों पुरानी प्रकृति-संवेदनशील, जीवनदायिनी और सामूहिक ज्ञान परंपराओं के साथ उपचार विधियोँ, लोक-भाषाओं व सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के संवर्धन की जरूरत बताई है। इस अवसर पर वनवासी कल्याण परिषद मध्य भारत प्रांत के अध्यक्ष सुभाग सिंह मुजाल्दा और भाजपा नेता संजय सक्सेना सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी व कार्यकर्ता मौजूद थे।
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