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मध्यप्रदेश
लापरवाही या मिलीभगत: किसानों तक नहीं पहुंचा अमानक खाद का पैसा
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कैग रिपोर्ट से उजागर हुईं किसानों को अमानक उर्वरकों की बिक्री, आवंटन और परीक्षण की गड़बडिय़ां
भोपाल। फसलीय और उद्यानिकी फसलों में उपयोग के लिए केन्द्र सरकार द्वारा किसानों को आर्थिक छूट (सब्सिडी) के साथ बेचे जाने वाले उर्वरक (खाद) की मप्र में उपलब्धता, आवंटन, गुणवत्ता परीक्षण तक में गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई हैं।
वर्ष 2017 से 2022 की अवधि में किसानों/समितियों को उपलब्ध उर्वरक की लेखापरीक्षा में नियंत्रक महालेखापरीक्षक (कैग)ने पाया कि अमानक खाद बेचने वाली कंपनियों के भुगतान से काटी जाने वाली जो राशि विज्ञप्ति के माध्यम से सूचना देकर किसानों को वापस वापस की जानी थी, प्रबंध संचालक मार्कफेड की लापरवाही से एक भी किसान को यह राशि वापस नहीं हो सकी।
क्या है अमानक उर्वरक कोष
मप्र सरकार ने नवम्बर 2002 में अमानक उर्वरक की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के भुगतान से काटी गई राशि को जमा करने के लिए अमानक उर्वरक कोष बनाया था। उर्वरकों का उपयोग करने वाले किसानों को कोष से यह राशि वापस करनी होती है। इसके लिए अमानत खाद खरीदी का दावा करने के लिए किसानों/ासमितियों का सूचना मिल सके और वे दावा कर सकें, इसके लिए मार्कफेड के एमडी को दो समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित कराना होता है। दो वर्ष तक जिन किसानों द्वारा दावे नहीं किए जाते, उनके हिस्से की राशि कोष में जमा होती है। कोष की इस राशि का उपयोग किसानों के कल्याण के लिए किया जाता है।
अधिकारियों की यह रही लापरवाही
2017 से 2022 के बीच 8,885 मेट्रिक टन अमानक उर्वरक में से 2561 मेट्रिक टन किसानों को बेचा दिया गया, जबकि 6324 मेट्रिक टिन की बिक्री नहीं हुई। प्रबंध संचालक मार्कफेड ने इस अवधि में आपूर्तिकर्ता के भुगतान की 13.10 करोड़ में से 10.74 करोड़ काट लिए। अमानक उर्वरक कोष को देय 1.36 करोड़ में से, मार्कफेड ने कोष को 1.26 करोड़ का भुगतान किया। शेष 10 लाख रुपये दिसम्बर 2023 तक बकाया थी। प्रबंध संचालक मार्कफेड ने 2017 से 2021 के बीच केवल एक बार समाचार पत्र में विज्ञापन प्रकाशित किया। जबकि 2018 से 2022 के बीच एक भी विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ। नियमानुसार सूचना प्रकाशन नहीं होने से एक भी किसान की ओर से दावा नहीं किया जा सका। पंजीयक, सहकारी समितियां, भोपाल ने भी वांछित उद्देश्य के लिए कोष का उपयोग नहीं किया गया। अपर मुख्य सचिव ने मामले की जांच की बात कही है।
किसानों का महंगा बेचा गया खाद
कैग की रिपोर्ट बताती है कि आपूर्तिकर्ताओं ने खरीफ 2019 में अग्रिम अवधि में खरीद करने पर डीएपी में 1100 और एमओपी में 700 रुपये प्रति मीट्रिक टन की छूट का प्रस्ताव दिया था। उर्वरक समन्वय समिति ने अप्रैल 2019 में प्रबंध संचालक, मार्कफेड को नियमित अवधि की विक्रीदर तय करने का आदेश दिया, लेकिन प्रबंधन संचालक ने छूट के साथ बिक्री मूल्य तय नहीं किया। इससे किसानों पर 10.50 करोड़ अतिरिक्त बोझ पड़ा। मार्च से जुलाई 2019 के बीच किसानों को उच्च दर पर उर्वरक बेचे गए। समिति के आदेश के बावजूद किसान छूट के लाभ से वंचित रहे ओर उन्हें एलएमटी 57.75 रुपये एवं एमओपी 35 रुपये प्रति बोना महंगा खरीदना पड़ा।
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