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जंगलों पर भारी पड़ रही अधिकारियों की लापरवाही
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अतिक्रमण में हेरफेर-वसूली में कोताही, शासन को पहुंचाया 389 करोड़ का राजस्व घाटा
भोपाल। मध्यप्रदेश वनों की सुरक्षा और उनसे प्राप्त होने वाले राजस्व को वन विभाग के अधिकारी ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने अक्टूबर 2018 से मार्च 20 22 की अवधि की वन प्राप्तियों के प्रबंधन की लेखापरीक्षा (ऑडिट) के माध्यम से विभाग के अधिकारियों की लापरवाही और अनियमितता को उजागर किए है। सीएजी ने पाया कि 25 वन मंडलों में ढाई साल की इस अवधि में अधिकारियों की लापरवाही के कारण शासन को 389.51 करोड़ का राजस्व घाटा उठाना पड़ा है।
भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक (सीएजी) रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 77493 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले मप्र के वन, जो राज्य के मुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.41 प्रतिशत है। इमारती लकड़ी, बांस और जलाऊ लकउ़ी, मुख्य काष्ठ वनोपज है, जो राजस्व सृजन करते हैं। इसके अलावा यहां तेंदुपत्ता, साल बीज, हर्रा, गोंद, चिरौंजी, महुआ के फूल और बीज इत्यादि गैर काष्ठ जैसे वनोपज भी हैं। मप्र राज्य लघु वन सहकारी संघ गैर काष्ठ वन उत्पादों का व्यापार करता है और उनके विक्रय से प्राप्त राशि राज्य के वन-राजस्व का हिस्सा नहीं है। व्यापारियों, के साथ काष्ठ उत्पाद का व्यापार विभाग द्वारा नीलामी और निस्तारी से किया जाता है। कटाई योग्य लकड़ी को चिन्हित कर वर्षा के पहले कूपों के माध्यम से इसे कटवाया जाता है। वन उत्पाद डिपो में ले जाकर इसे नीलामी के माध्यम से बेचा जाता है। इसके अलावा वन राजस्व में लीज रेंट, डिवीडेंट, शास्ति, क्षतिपूर्ति, फीस, कटाई एवं पर्यवेक्षण शुल्क इत्यादि शामिल होते हैं।
माफिया-ठेकेदारों पर मेहरबानी से इस तरह हुई हानि
इमारती लकड़ी को बता दिया जलाऊ लकड़ी : तीन मंडलों में इमारती और जलाऊ लकड़ी का अनुमानित उत्पादन 751 घ.मीटर था। वास्तव में यह 779 घ.मीटर था। मंडलों ने बोलीदाताओं को लाभ पहुंचाने वास्तविक उत्पादन की गणना के समय अनियमित रूप से महंगी इमारती लकड़ी को सस्ती जलाऊ लकड़ी में परिवर्तित कर दिया। इससे शासन को 45 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ।
ठेकेदार से सुरक्षा जमा एवं अर्थदण्ड : रायसेन, नर्मदापुरम,हरदा, खंडवा आदि वन मंडलों में ठेकेदारों से अनुबंध में अनुसार सिक्योरिटी डिपोजिट जमा नहीं कराए जाने और उन पर अर्थदण्ड लगाकर ठेकेदारों को आर्थिक लाभ पहुंचाया।
वन अपराधों में कम क्षतिपूर्ति वसूली : छह वन मंडलों में वन अपराध के 105 प्रकरणों में 2.24 लाख का वनोपज जब्त किया। इसके लिए 4.48 लाख के स्थान पर 1.46 लाख की ही वसूली की गई।
अवैध कटाई से राजस्व हानि : कटाई के लिए चिन्हाकित पेड़ों को मार्किंग बुक्स में दर्ज नहीं किया गया। अवैध कटाई हुई। शासन को 1.09 करोड़ का नुकसान हुआ।
- पारगमन शुल्क की वसूली कम या नहीं होना : सतना, सिंगरौली झाबुआ, शहडोल वन मंडलों में खनिज पट्टाधारकों से कम पारगमन शुल्क वसूला गया।
अतिक्रमण से राजस्व हानि : छह वन मंडलों में 60822.829 हे. वन भूमि पर अतिक्रमण था। वन मंडल अधिकारियों ने 26380.425 हे. कम, कुल 23,442.404 हे. पर ही अतिक्रमण बताया। 47820.343 हे.वन क्षेत्र पर अवैध कब्जों से वनों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हुआ।
अधिकारियों की लापरवाही राजस्व पर पड़ी भारी
भुगतान में देरी : मप्र राज्य वन विकास निगम से बांध और सागौन बिक्री का लीज रेंट और डिवीडेंट का भुगतान नहीं किया या देरी से किया। इससे ब्याज के रूप में 23.12 करोड़ की हानि हुई।
कटाई में देरी : वन मंडलों में कटाई की अनुमति मांगने में असामान्य देरी हुई। चारों मंडलों में 15,77, 3700 राजस्व अवरुद्ध हुआ।
भारत सरकार के नियमों का उल्लंघन : आठ वन मंडलों में भारत सरकार के नियमों के विरुद्ध मप्र में 14575.68 घन.मी. अधिक कटाई हुई। विभग ने इसे अवैध कटाई, हवा से गिरे पेड़ और वन संरक्षण के लिए कटना बताया।
पेड़ों की कटाई नहीं होने से राजस्व हानि : 90 कूपों में 178591 पेड़ों को काटने के लिए चिन्हांकित किया गया था। कम कटाई से इमारती और जलाऊ लकड़ी कम प्राप्त हुई। इससे 13.30 करोड़ राजस्व अवरुद्ध हुआ।
बांस उत्पादन में कमी : छह मंडलों में बांस के उत्पादन में 13 से 100 प्रतिशत की कमी से 6.31 करोड़ की राजस्व हानि हुई।
इन कारणें से भी हुई राजस्व हानि
- डिपो में पुनर्मापन पर वनोजन में कमी से हानि
- भौतिक सत्यापन में वनोपज कमी से हानि
- लकड़ी का निस्तारण न होने से राजस्व हानि
- प्रतिपूरक वनीकरण और गलत वर्गीकरण में शुल्क लगाने से राजस्व घाटा।
- परागमन अनुमति लेने वाले पट्टाधारकों द्वारा लेखापुस्तिका संधारित नहीं की गई।
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