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सामंजस्य और सहमति से पुनर्गठित होंगी जिला इकाईयां
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भारी गुटबाजी के बीच मप्र में कैसे पूरा होगा कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व का सपना
भोपाल । अहमदाबाद (गुजरात) के साबरमती आश्रम में संपन्न हुए कांग्रेस के दो दिवसीय 84वें राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रस्ताव पारित हुआ है कि कांग्रेस संगठन को जिला स्तर पर मजबूती दी जाएगी। जिलाध्यक्षों को अधिक शक्तियां दी जाएंगी। केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर पार्टी का प्रदेश नेतृत्व अब हर जिले में संगठन की मजबूती का आंकलन करेगा और आवश्यकता के हिसाब से जिलों में बड़ा बदलाव भी करेगा। जिन भी जिलों में संगठनात्मक परिवर्तन होगा, वहां नियुक्ति सीधे राजधानी से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर से होगा। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की सहमति के साथ-साथ उस क्षेत्र से जुड़े प्रदेश और केन्द्रीय स्तर के नेताओं की सहमति भी इसमें ली जाएगी। इस तरह आगामी कुछ दिनों में कांग्रेस की जिला इकाईयों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
प्रदेश कार्यकारिणी को छोटा नहीं कर सके जीतू
कांग्रेस में भारी गुटबाजी का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हर संभव कोशिश के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी अपनी प्रदेश कार्यकारिणी को छोटा नहीं कर सके थे। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने बहुत सीमित कार्यकारिणी बनाने की घोषणा की थी, लेकिन 10 महीने बाद जब दो बार में जम्बो कार्यकारिणी घोषित हुई। पहली सूची में 71 महासचिव और 17 उपाध्यक्ष सहित कुल 177 पदाधिकारी और दूसरी सूची में 84 सचिव, 36 संयुक्त सचिव सहित कुल 158 नामों की घोषणा की गई। इस तरह पटवारी ने अपनी टीम में कुल 335 नाम शामिल किए। कुछ ने घोषणा के साथ ही त्यागपत्र भी दे दिया था।
क्षेत्र के हिसाब हर गुट को मिलेगा अवसर
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के कई बड़े गुट हैं। जिनका नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह करते हैं। वर्तमान में प्रदेश अध्यक्ष भलें जीतू पटवारी हैं, लेकिन संगठन में सर्वाधिक वर्चस्व दिग्विजय सिंह का है। इसी कारण अजय सिंह और कमलनाथ सहित दूसरे नेता खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं। केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर जिलों में जो नई व्यवस्था लागू करने का प्रयास हो रहा है, उसमें इन सभी बड़े नेताओं की सहमति तो होगी। लेकिन अनुशंसा सिर्फ उस क्षेत्र के लिए प्रभावी होगी, जो उनका गृह या प्रतिनिधित्व वाला क्षेत्र है। यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में गुटबाजी नहीं होगी, बल्कि जिसे भी जिलाध्यक्ष बनाया जाएगा, वह किसी न किसी गुट का प्रतिनिधित्व जरूर करेगा।
क्षेत्रवार होगा गुटों की शक्तियों का विभाजन
ग्वालियर-चम्बल के जिलों में दिग्विजय सिंह की अनुशंसा प्रभावी रहेगी तो वहीं छिंदवाड़ा के अलावा बालाघाट में कमलनाथ समर्थकों को अवसर मिल सकता है। जीतू पटवारी इंदौर और उज्जैन सहित मालवा के कुछ अन्य जिलों में समर्थकों के लिए अड़ेंगे। रीवा संभाग के सभी छह जिलों में अजय सिंह और विवेक तन्खा से अभिमत लिए जाएंगे। अरुण यादव इंदौर संभाग के खण्डवा, खरगोन और धार में और कांतिलाल भूरिया झाबुआ के अलावा मंडला और ङ्क्षडंडोरी में समर्थकों को जिलाध्यक्षी दिलाने का प्रयास करेंगे। राजधानी भोपाल के शहर एवं ग्रामीण में प्रदेश अध्यक्ष पटवारी अपने समर्थकों को अवसर देने का प्रयास करेंगे, लेकिन दिग्विजय सिंह के हस्तक्षेप के चलते ऐसा हो पाना आसान नहीं होगा।
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