राजधानी

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कड़ाके की ठंड में खुला आसमान, सिर्फ कंबल का सहारा

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एम्स में भर्ती मरीजों के परिजनों के लिए करुणेश्वरी धाम एक मात्र बसेरा

भोपाल। राजधानी भोपाल में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। इस सर्दी ने भोपाल एम्स में मध्यप्रदेश और उससे सटे राज्यों के अलग-अलग शहरों से उपचार कराने पहुंचे मरीजों के परिजनों की परेशनी बढ़ा दी है। दिनभर मरीजों की सेवा-देखरेख के बाद रात्रि विश्राम के लिए एम्स परिसर के टीन-शेड और फुटपाथ पर खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं। करीब एक सैकड़ा से अधिक परिजन खुले आसमान में सिर्फ कंबल और चादरों के सहारे ठिठुरते हुए रात्रि गुजारने को मजबूर हैं। 

करुणेश्वरी धाम आश्रम में नहीं बची जगह

राजधानी भोपाल के करुणाधाम आश्रम द्वारा एम्स परिसर में मरीजों के परिजनों के ठहरने, उनके भोजन-नाश्ता आदि की नि:शुल्क व्यवस्था हेतु संचालित करुणेश्वरी धाम आश्रम में भी हर दिन क्षमता से अधिक परिजन पहुंच रहे हैं। यहां रात्रि विश्राम के लिए उपलब्ध बंकर बैड एवं शयनकक्ष की कुल क्षमता 300 से 350 तक है, जो इन दिनों पूरे भर रहे हैं। खास बात यह है कि आश्रम और अस्पताल के अनुबंध के अनुसार यहां मरीज के परिजनों के रात्रि विश्राम हेतु एम्स प्रबंधन की ओर से अनुमति आदेश जारी होता है। इसलिए अटेण्डर के रूप में एक से अधिक परिजन आने की स्थिति में उनके रात्रि विश्राम की व्यवस्था नहीं हो पाती है। हालांकि प्रतिदिन 250 से 300 लोगों के लिए सुबह का नाश्ता, 700 से 800 लोगों के लिए दोपहर एवं करीब 600 लोगों के लिए रात्रि भोजन की व्यवस्था आश्रम द्वारा की जा रही है।  

टीन-शेड और फुटपाथ सभी फुल 

एम्स अस्पताल परिसर के मुख्य प्रदेश द्वारों के बाहर लगे टीनशेड रात-दिन मरीजों के परिजनों से भरे देखे जा सकते हैं। चूंकि अस्पताल में मरीजों के पास सिर्फ एक अटैण्डर के रहने की अनुमति होती है। इसलिए साथ आए हुए एक से अधिक लोगों को बाहर स्वयं की व्यवस्था से रुकना होता है। टीनशेड फुल होने के बाद परिसर में करुणेश्वरी धाम आश्रम के ठीक सामने वाला फुटपाथ परिजनों से भरा नजर आ रहा है, जो सिर्फ एक कंबल या चादरों के सहारे रात्रि गुजार रहे हैैं। 

मरीजों के साथ परिजन भी हो रहे भर्ती 

एम्स के फुटपाथ पर सोते लोगों ने बताया कि इस कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे सो रहे कई मरीजों के परिजन भी बीमार होकर एम्स में भर्ती हुए हैं। बाहर से आने वाले परिजन ओढऩे-बिछाने के पर्याप्त कपड़े लेकर नहीं आते हैं। कई परिजनों पर बाजार से अतिरिक्त कपड़े खरीदने के पैसे तक नहीं हैं।