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मध्यप्रदेश
पर्यावरणविद्य पद्यश्री डॉ. मोहन नागर बोले-प्रकृति के साथ समन्वयक बैठाकर हो रहे विकास
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भोपाल। देश और प्रदेश में विकास तो आवश्यक है। सडक़ें भी बनानी होंगी और औद्योगिक विकास भी करना होगा। लेकिन यह सब काम प्रकृति के साथ समन्वय बैठाकर होगा तो प्रकृति और जैव विविधता अस्तित्व बचा रहेगा। केन्द्र और राज्य की सरकारों ने मप्र जन अभियान परिषद की ओर से दिए गए कई सुझावों को माना भी है। देश और प्रदेश की सरकारें प्रकृति के संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास कर भी रही हैं। यह बात पर्यावरण संरक्षण, जल संवर्धन और सामाजिक कार्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयासों के लिए हाल में राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू के हाथों पद्मश्री से सम्मानित हुए मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर ने विशेष चर्चा में कही।
संगठन से मिली सहयोग और संरक्षण की प्रेरणा
श्री नागर बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण और जल संवर्धन के प्रयासों की शुरूआत संगठन की प्रेरणा से हुई। शुरूआत में बैतूल में एकल विद्यालय संचालित किया। जल अभाव वाले इस क्षेत्र में जनजागरुकता के लिए पदयात्रा निकाली। फिर अलग-अलग वर्षों में 50-60 गांवों में जल संवर्धन के प्रयास हुए। छोटी-छोटी जल संरचनाओं में बोरी बंधान जैसे प्रयासों से जल संचय किया। स्थानीय लोगों को अभियानों से जोड़ा तो प्रयास काफी हद तक सफल भी हुए। अन्य क्षेत्रों में भी प्रयास किए। हालांकि बाद में सरकार ने क्षेत्र में स्टॉप डेम और बांध भी बना दिए हैं।
सरकार के अभियानों से समाज को जोड़ रहा परिषद
मप्र जन अभियान परिषद के प्रयासों को लेकर परिषद के उपाध्यक्ष श्री नागर ने कहा कि हम सरकार की योजनाओं को समाज के अंतिम वर्गों तक ले जाने एवं उन योजनाओं में समाज की जनभागीदारी के लक्ष्य के साथ काम कर रहे हैं। राज्य, संभाग, जिला और विकासखंड स्तर तक मप्र जन अभियान परिषद की सशक्त संरचना है। विकासखंड स्तर पर समन्वयक हैं। उसके नीचे नवांकुर संस्थाएं हैं। हर विकासखंड स्तर पर 25-25 ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियां तथा मुख्यमंत्री सामुदायिक क्षमता विकास कार्यक्रम के हजारों विद्यार्थी हैं। इसके अलावा परिषद सरकार के विभिन्न अभियानों में भी समाज की भागीदारी करा रही है। जल गंगा संवर्धन अभियान से ही प्रदेशभर में लगभग 40 लाख लोगों को जोड़ा। अभियान के तहत लगभग एक लाख गतिविधियां कर चुके हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में अभियान ने गति पकड़ी है और समाज लगातार अभियान से जुड़ा है।
पाठ्यक्रम में जोडऩा होगा जल संरक्षण विषय
श्री नागर ने कहा कि जल के प्रति समाज में जनजागरुकता और लोगों के मन में संवेदना पैदा करना होगी। लोगों को जल का महत्व को समझना होगा। कई बार जल संकट के समय ही हमें इसका महत्व समझ आता है, जल की उपलब्धता पर हम उसे भूल जाते हैं। इसलिए जल के प्रति जनसंवेदना पैदा होने पर इसकी उपलब्धता के समय भी जल का अनुशासनपूर्वक करेंगे। श्री नागर ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने इसे बहुत पहले से अपनाया था। इसलिए दैनिक उपयोग में भी जल के उपयोग के लिए लोटे का उपयोग करते थे। विगत 3-4 दशक की आधुनिक दिनचर्या में उसे हम भूल गए। इसलिए अब इसे पाठ्यक्रम में जोडऩा होगा, परिवारों को समझाना होगा। पंचपरिवर्तन में पर्यावरण विषय इसलिए शामिल किया गया है, जिससे समाज में यह बात जाए कि जल ही प्रमुख है, जल रहेगा तो शेष सभी चीजें रहेंगी।
कई संकटों आमंत्रण दे रही पानी की कमी
तीस-चालीस फीट का भूजल स्तर अब 500 और हजार फीट के नीचे जा चुका है। यह पानी का दोहन नहीं, दोहन है। धरती के अंदर सौ-डेढ़ सौ फीट अंदर के जल को लेने का अधिकार हमें नहीं है। वह धरती को ठंडा रखने का जल है। वह जल निकाला तो धरती पहले से गरम, पानी निकलेगा तो यह तापमान और बढ़ेगा। सौ डेढ़ सौ वर्षों में तापमान को डेढ़ डिग्री तक बढ़ा दिया। विगत 40-50 सालों में तो इसमें अधिक वृद्धि हुई है। एकाध डिग्री और बढा तो कई प्रकार के जीव-जंतु समाप्त हो जाएंगे। जैव विविधता, कई प्रकार की वनस्पतियां और कई पेड़-पौधे खत्म हो जाएंगे। पानी कम होने से एक नहीं, अनेक प्रकार के संकट आएंगे। जल के समाप्त होने से सिर्फ मनुष्य के लिए संकट नहीं आएगा, बल्कि पूरी जैव विविधता समाप्त हो जाएगी। पंच तत्वों, विशेषकर जल का संरक्षण जरूरी है। सरकार तो अपना काम कर रही है, हर व्यक्ति का जागरुक होना और सहयोग करना आवश्यक है।
सरकारों ने माने परिषद के सुझाव
वन संरक्षण और अवैध कटाई को लेकर श्री नागर ने कहा कि जंगल ही हैं जो सबसे अधिक जल संरक्षण करते हैं। इसलिए परिषद की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडक़री को सुझाव दिया गया था कि जंगली क्षेत्रों में राजमार्गों का निर्माण पुरानी दोमार्गी सडक़ों के साथ जोडक़र किया जाए। इसके अलावा सडक़ निर्माण के लिए एक तरफ के ही आवश्यक पेड़ काटकर चौड़ीकरण किया जाए। श्री नागर ने कहा कि प्रधानमंत्री ने काफी हद तक इस सुझाव पर काम किया है और जगली क्षेत्रों में राजमार्ग फ्लाय ओवर बनाकर निकाले जा रहे हैं, जिससे पेड़-पौधों की कटाई के साथ ही जंगली जीव-जंतु भी संरक्षित रह सकें।
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