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फर्जी जाति प्रमाण पत्रों से सरकारी नौकरी कर रहे कई अधिकारी
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5 सालों में जाति प्रमाण पत्रों की जांच के 227 प्रकरण छानबीन समिति के पास लंबित
भोपाल। मप्र से अनुसूचित जाति-जनजाति के फर्जी प्रमाण-पत्र लगाकर केन्द्र एवं राज्य (मप्र-छग) सरकार के विभागों और एजेंसियों में शासकीय नौकरी पा चुके कई अधिकारी-कर्मचारी वर्षों से अधिकारी बने बैठें हैं। जाति-प्रमाण पत्रों की जांच के कई प्रकरण छानबीन समिति के पास लंबित हैं। जबकि कुछ प्रकरणों में आरोप सही पाए जाने के बाद प्रकरण अलग-अलग स्तर पर न्यायालयों में भी लंबित हैं।
उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे द्वारा विधानसभा में पूछे गए प्रश्न के जवाब में जनजातीय कार्यमंत्री विजय शाह ने जो जानकारी उपलब्ध कराई है, उसके अनुसार मध्यप्रदेश में 1 जनवरी 2020 से अब तक करीब साढ़े पांच सालों में अजा-अजजा के जाति-प्रमाण पत्रों की जांच हेतु गठित छानबीन समिति के पास लंबित प्रकरणों की संख्या 227 है। इसमें 107 प्रकरण अनुसूचित जनजाति के और 120 प्रकरण अनुसूचित जाति के हैं। प्रकरणों के लंबित होने के अलग-अलग कारण बताए गए हैं। खास बात यह है कि जांच अवधि में कुछ शासकीय सेवक सेवानिवृत्त तक हो चुके हैं।
इन प्रमुख पदों पर हैं आरोपी
अपर सचिव गृह विभाग, न्यायाधीश, जेल अधीक्षक, सीएमएचओ, मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता, अधीक्षक, सीजीएसटी, उप संचालक ग्रामोद्योग एवं कृषि विभाग, सहायक प्रबंधक राज्य सहकारी बैंक, सीएचओ, उप संचालक सामाजिक न्याय, वन क्षेत्राधिकारी, मुख्य वन मंडल अधिकारी, उप नियंत्रक शासकीय प्रेस, संयुक्त संचालक टीएनसीपी, सहायक प्राध्यापक, वरिष्ठ उप पंजीयक, सीएमओ, महाविद्यालय प्राचार्य, अधीक्षण यंत्री, खनिज अधिकारी, इसके अलावा भोपाल स्थित मंत्रालय में पदस्थ अधिकारी-कर्मचारियों की जांच समिति के पास लंबित है।
5 साल में अजा के 63 प्रकरणों का निराकरण
जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए गठित छानबीन समिति ने विगत 5 सालों में कुल 63 प्रकरणों का निराकरण किया हैै। इनमें 34 प्रकरणों में निर्णय विपक्ष में हुआ और 20 प्रकरण पक्ष में निराकृत हुए हैं। एक प्रकरण 23 अक्टूबर 2024 को कलेक्टर रायसेन को निराकरण के लिए भेजा गया है। जबकि सात प्रकरणों को नस्तिबद्ध किया गया है। इसी प्रकार अजजा के प्रकरण भी पक्ष-विपक्ष में निराकृत हुए हैं। अधिकांश प्रकरणों में निष्कासन जैसी ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
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