विशेष

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देश के सबसे स्वच्छ शहर की नदियां सबसे दूषित

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उद्गम और निर्गम पर जो चम्बल साफ, स्वच्छ और निर्मल, नागदा से नीमच के बीच अत्यधिक प्रदूषित 

- नागदा के बाद 120 किमी तक चंबल भी अतिप्रदूषण का शिकार  



भोपाल। मध्यप्रदेश के पांच बेसिन से निकलीं प्रमुख नदियों में से अधिकांश में प्रदूषण की मात्रा नगण्य है। जबकि देश के सबसे स्वच्छ इंदौर से सटी तीन प्रमुख नदियां अतिप्रदूषण का शिकार हैं। इस नदियों में प्रदूषण का मानक स्तर ‘डी’ और ‘ई’ श्रेणी तक है। जबकि इंदौर से निकली चंबल उज्जैन के पिपलोदाडेम नागदा तक स्वच्छता की ‘ए’ श्रेणी में शामिल है। अचानक की जूनानागदा में इसका प्रदूषण ‘ई’ श्रेणी तक खतरनाक हो जाता है। उज्जैन से मंदसौर तक यह ‘डी’ श्रेणी के अतिप्रदूषण का शिकार है। लेकिन मंदसौर में गांधीसागर में विलय के बाद यह एक बार फिर से ‘ए’ श्रेणी की स्वच्छता के साथ नीमच पहुंचती है। यहां से राजस्थान होते हुए, आगे पूरे रास्ते में भी यह ‘ए’ श्रेणी की स्वच्छता के साथ बहकर यमुना नदी में समा जाती है। 

इंदौर से सटी यह नदियां सबसे अधिक प्रदूषित 

कान्ह (खान) नदी: प्रदूषण नियंत्रण मंडल (पीसीबी) के वर्ष 2024-25 के प्रतिवेदन के अनुसार लीम्बोडी, इंदौर में इसके प्रदूषण का स्तर ‘बी’ श्रेणी का मिला। जबकि शिवाधाम, इंदौर में ‘डी’ और इंदौर के ही नॉर्थतोड़ा, अहिल्यासागर, भगीरथपुरा, खाटीपुरा, कवीटखेड़ी, शक्करखेड़ी और धानखेड़ी तक यह ‘ई’ श्रेणी के प्रदूषण के साथ बहती मिली। सनवर, भदोदीयाखान, शहदब्रिज, पिपलिया राघव स्टापडेम तक ‘डी’ और रामवासा पहुंचकर यह एक बार फिर से ‘ई’ श्रेणी के प्रदूषण में परिवर्तित मिली। खान नदी में प्रदूषण का कारण क्षेत्र की कई औद्योगिक इकाईयों और घरों के कचरे को माना जाता है। 


सरस्वती नदी- इंदौर के जिन क्षेत्रों से यह नदी गुजरी है, सभी जगह नदी के जल प्रदूषण का स्तर ‘डी’ श्रेणी का है। कैग ने मन्डीब्रिज, बीजलपुर, राजीवगांधी चौक, बद्रीबाग, इंदौर, करबला ब्रिज, चंद्रभागा, जूनी इंदौर क्षेत्रों से पानी के नमूने लेकर परीक्षण किया। इस नदी के प्रदूषण का कारण खान नदी से मिलने वाले दूषित जल को माना जाता है। 

वर्ष 2024-25 में प्रमुख नदियों के प्रदूषण की स्थिति 

- नर्मदा नदी- 52 स्थानों से लिए जल के नमूनों में 50 स्थानों पर ‘ए’ और 2 स्थानों पर ‘बी’ श्रेणी। 

- बेतवा नदी- 13 स्थानों से लिए जल के नमूनों में 8 स्थानों पर ‘ए’ और 5 स्थानों पर ‘बी’ श्रेणी। 

- चम्बल नदी- 16 स्थानों से लिए जल के नमूनों में 11 स्थानों पर ‘ए’ और 4 स्थानों पर ‘डी’ और एक स्थान पर ‘ई’ श्रेणी। 

- सोन नदी- 14 स्थानों से लिए जल के नमूनों में 13 स्थानों पर ‘ए’ और एक स्थान पर ‘बी’ श्रेणी। 

- तपस (टोन्स) नदी- 11 स्थानों से लिए जल के नमूनों में से 9 स्थानों पर जल की गुणवत्ता ‘ए’ और 2 स्थानों पर ‘बी’ श्रेणी। 

- केन नदी- 3 स्थानों से, ताप्ती बेसिन- 6 स्थानों से, वैनगंगा नदी-  6 स्थानों से और माही नदी- 4 स्थानों से लिए जल के सभी नमूनों की गुणवत्ता ‘ए’ श्रेणी की मिली। 


इस तरह पुन: निर्मल होती है चम्बल 

उद्गम पर स्वच्छ, बीच में दूषित लेकिन आगे चलकर फिर से निर्मल आखिर कैसे? जानकार बताते हैं कि उद्गम स्थल जनापावा से धार और नागदा तक यह स्वच्छ रहती है। लेकिन लेकिन जूनानागदा पहुंचकर यह अति प्रदूषित हो जाती है। इसका कारण औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपशिष्ट और शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले कचरे को माना जाता है। जूनानागदा में इसमें दो गंदे नाले भी मिलते हैं। इससे यह अति प्रदूषित (ई-श्रेणी) हो जाती है। हालांकि पानी के निरंतर बहाव और आगे अधिक चौड़ाई मिलने पर यह धीरे-धीरे स्वत: स्वच्छ होती जाती है। उज्जैन के आगे यह मंदसौर जिले में स्थित गांधीसागर बांध में मिल जाती है। इससे पानी और अधिक साफ हो जाता है। यहां से आगे राजस्थान के कोटा में गांधी सागर, राणा प्रताप और कोटाबैराज के बांधों में विलय से एक बार फिर से यह निर्मल होकर मप्र के श्योपुर जिले में निकलती है और (पोरसा) मुरैना, फूफ (भिण्ड) और रोडब्रिज मुरैना से होकर धौलपुर (राजस्थान) और इटावा (उत्तर प्रदेश) पहुंचकर साफ-स्वच्छ जल के साथ यमुना नदी में मिल जाती है। मप्र और राजस्थान के रास्ते में सहायक नदियों बनास, क्षिप्रा, कालीसिंध, पार्वती, मेज, कूनों, और ब्राह्मणी का पानी मिलने से भी इसका प्रदूषण भी कम होता है और प्रवाह भी तेज होता है।