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रेत माफिया चोरी कर ले गया 6 करोड़ की रेत
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-प्रतिबंधित अवधि में ग्वालियर-चंबल, बुंदेलखंड, बघेलखंड और मालवा में सबसे ज्यादा अवैध उत्खनन
भोपाल। बारिश के सीजन में तीन महीने प्रतिबंध रहने के बावजूद ग्वालियर-चंबल, बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा,जबलपुर के रेत माफिया ने छह नदियों से 1.50 लाख घनमीटर रेत चुरा ली। रेत के लालच ने सबसे ज्यादा नुकसान बेतवा, नर्मदा, सोन, सिंध, पार्वती और चंबल को पहुंचाया है। चिंताजनक बात यह है कि प्रदेश के 313 विकासखंडों में से 26 ऐसे हैं, जहां सबसे ज्यादा उत्खनन हो रहा है। नदियों के तल से रेत निकालने की वजह से गहरे दलदल बन गए हैं, जिनमें फंसने से हर वर्ष करीब एक दर्जन लोगों की मौत हो रही है।
प्रदेश के 3 लाख 8 हजार 245 वर्ग किलामीटर क्षेत्र को सिंचित करने की क्षमता वालीं नर्मदा, वेत्रवती, सोन, ताप्ती, चंबल, सिंध, माही, पार्वती, धसान, केन, कूनो, क्षिप्रा सहित 30 से अधिक नदियों में सबसे ज्यादा लूट हुई है। अत्यधिक दोहन का परिणाम है कि नदियों का बहाव असंतुलित हुआ है और ग्रामीण भी अब जल स्तर का अंदाज नहीं लगा पा रहे। सात प्रमुख नदियों की 150 से अधिक सहायक नदियों की स्थिति भी खराब है। केन्द्रीय जल शक्ति मंत्रालय भी नदियों की स्थिति को लेकर चिंता जता चुका है। ग्राउंड वाटर ईयरबुक में भी प्रदेश की नदियों में हो रहे अवैध उत्खनन को चिंता का विषय बताया गया था, इसकेे बाद भी प्रशासन, खनिज, वन, जल संसाधन केे साथ ही पुलिस भी रेत माफिया पर अंकुश नहीं लगा सकी है।
नदियों के तल से ही निकाली जा रही रेत
पिछले वर्ष प्रमुख सचिव ने सभी संभागायुक्त एवं जिलाधीशों को पत्र लिखकर रेत की उपलब्धता वाली खदानों की सूची मांगी थी। इसकेा लेकर किसी ने गंभीरता नहंी दिखाई। वर्तमान में मौजूद लगभग 700 खदानों में अधिकतर जगह नदियों के तल से ही रेत निकाली जा रही है।
रेत समूह और माफिया का गठजोड़
माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर के रूप में दर्ज 38 रेत समूहों का दबदबा लगभग हर जिले के माइनिंग विभाग में है। रेत समूह लोकल माफिया के साथ मिलकर अवैध उत्खनन को बढ़ावा दे रहे हैं। लगभग 5 हजार करोड़ प्रतिवर्ष का वैध-अवैध व्यापार हो रहा है।
जियोटैगिंग में सबसे ज्यादा गड़बड़ी
माइनिंग विभाग उत्खनन पर निगरानी करने के लिए सेटेलाइट का उपयोग कर रहा है। विभाग जियोटैगिंग के दावे कर रहा है, जबकि राजस्व विभाग के पुराने नक्शों के हिसाब से अगर मिलान किया गया तो सबसे ज्यादा गड़बड़ी टैगिंग में ही निकलेगी।
एनजीटी के सामने उजागर हो चुकी गड़बड़
रेत उठाने की अनुमति देने से पहले जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट या डीएसआर बनती है। इस रिपोर्ट में विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया पर्यावरण प्रबंधन का प्लान अनिवार्य होता है। यह डीएसआर कलेक्टर को दी जाती है, इसका मूल्यांकन करने के बाद सिया को भेजी जाती है। अधिकतर जिलों में एक ही रिपोर्ट को वर्षों से पेश किया जा रहा है। एनजीटी के सामने भी यह गड़बड़ उजागर हो चुकी है।
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