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पटवारी की टीम में कमलनाथ, दिग्विजय, भूरिया के गुट खत्म!
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ओबीसी से सबसे ज्यादा 4 यादवों को बनाया जिलाध्यक्ष
भोपाल। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी को पार्टी के सभी जिलाध्यक्षों के नाम तय करने में 20 महीने का समय लग गया है। लंबे इंतजार के बाद केंद्रीय नेतृत्व के ‘संगठन सृजन’ के माध्यम से जिन नामों का जिलाध्यक्षों के ऐलान किया गया है। उनमें ज्यादातर नए चेहरे हैं। कुछ जिलों में जिलाध्यक्ष के लिए चौंकाने वाले नेताओं के नाम पर मुहर लगाई गई है। खास बात यह है कि मप्र कांग्रेस में पहली बार है कि जिलाध्यक्षों के चयन में बड़े नेताओं का सीधा दखल नहीं दिख रहा है। एक तरह से प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में कांग्रेस आलाकमान ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ का गुट लगभग खत्म कर दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव और अजय सिंह को भी जिलाध्यक्षों के चयन में लगभग किनारे कर दिया है। पिछड़े वर्ग से सबसे ज्यादा यादव समाज के 4 नेताओं को जिलाध्यक्ष बनाया गया है।
कांगे्रस पार्टी ने इसके जरिए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के समाज को भी साधने की कोशिश की है। इस फैसले से अरुण यादव समेेत अन्य यादव नेता भी किनारे कर दिए गए हैं। जिलाध्यक्षों की सूची में सबसे बड़ा चौंकाने वाला नाम पूर्व कैबिनेट मंत्री जयवर्धन सिंह का गुना जिलाध्यक्ष और प्रियव्रत्त सिंह का राजगढ़ जिलाध्यक्ष बनाया जाना है। इसी तरह सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाह और उज्जैन के तराना से विधायक महेश परमार को जिलाध्यक्ष बनाना भी चौंकाने वाला फैसला है। क्योंकि ये चारों नेता प्रदेश पदाधिकारी हैं। जयवर्धन सिंह और महेश परमार प्रदेश उपाध्यक्ष, सिद्धार्थ कुशवाह पिछड़ा वर्ग कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। जबकि प्रियव्रत सिंह संगठन पदाधिकारी हैं। जिलाध्यक्षों की सूची में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की पसंद का छिंदवाड़ा और पांढर्ऩा जिलाध्यक्ष के अलावा अन्य कोई नाम नहीं है। भिंड शहर अध्यक्ष धर्मेन्द्र भदौरिया को पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह और सीधी अध्यक्ष ज्ञान प्रताप सिंह को अजय सिंह की पसंद का बताया जा रहा है। खास बात यह है कि प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी के करीबी एक भी नेता को जिलाध्यक्ष नहीं बनाया गया है।
कांग्रेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया का भी जनजाति वर्ग में दखल माना जाता था, लेकिन इस बार भूरिया को भी किनारे कर दिया है। वेशक भ्ूारिया के बेटे विक्रांत भूरिया झाबुआ से विधायक हैं, लेकिन नए जिलाध्यक्ष प्रकाश रंका उनके विरोधी माने जाते हैं। जनजाति जिलाध्यक्षों को पार्टी नेतृत्व खासकर राहुल गांधी की पसंद बताया जा रहा है। पिछले महीने राहुल गांधी ने मप्र के जनजाति विधायक एवं पदाधिकारियों को दिल्ली बुलाकर मुलाकात की थी। जिसमें ओमकार सिंह मरकाम समेत अन्य जनजाति नेता शामिल थे। मप्र के जनजाति नेताओं में ओमकार सिंह राहुल गांधी के सबसे करीबी माने जाते हैं। वे एआईसीसी पदाधिकारी भी हैं। ऐसे में उन्हें डिंडौरी जिलाध्यक्ष बनाए जाने के पीछे पार्टी की जनजाति वर्ग में मजबूत पकड़ बनाने से जोडक़र देखा जा रहा है।
जयवर्धन को जिलाध्यक्ष बनाने की वजह
यूं तो जयवर्धन सिंह के पास कभी जिल स्तर का संगठनात्मक दायित्व नहीं रहा। इस बार जिलाध्यक्ष बनाने के पीछे जो कहानी सामने आ रही है, उसे जयवर्धन सिंह के मप्र कांग्रेस में लगातार बढ़ते कद और ग्वालियर-चंबल में खासकर गुना-शिवपुरी में कांग्रेस के लगातार गिरते ग्राफ से भी जोडक़र देखा जा रहा है। साथ ही पिछले 5 साल में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने इस क्षेत्र में कांगे्रस का कोई बड़ा नेता खड़ा नहीं हो पाया है। कांग्रेस ने जिलाध्यक्ष बनाकर जयवर्धन सिंह को संगठन में प्रदेश पदाधिकारियों की दौड़ से बाहर कर दिया है। साथ ही केेंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ कांगे्रस को खड़ा करने के लिए नेता भी मैदान में उतार दिया है। इस फैसले को पार्टी नेतृत्व का बताया जा रहा है। बताया गया कि पिछले दिनों जयवर्धन सिंह का नाम प्रदेशाध्यक्ष के लिए चला था।
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