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आपातकाल के अत्याचार: मेरे जेल जाते ही परिवार पर टूटा मुसीबतों का कहर
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स्कूल में पढ़ा रहा था, अचानक उठा ले गई पुलिस, क्योंकि मैं स्वयंसेवक था : कालूराम छत्तानी
भोपाल। मैं उस समय 24 वर्ष का था और रेलवे में माल परिवहन का पिता जी का ठेका कारोबार मेरे जिम्मे था। परिवार में 14 छोटे भाई-बहन (सात भाई-सात बहन) थे, जिनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी मेरे पास थी। इसलिए परिवार का खर्च चलाने के लिए स्कूल में भी पढ़ाता था। मुझे मीसा बंदी बनाकर जेल में डाला गया तो, घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा, क्योंकि पिताजी अस्वस्थ रहते थे और भाई-बहिन छोटे थे। घर के हालात बिगड़ गए, कारोबार भी ठप पड़ गया था। मीसा की जेल मेरे परिवार पर मुसीबतों का कहर बनकर टूटी थी। मीसाकाल की यह व्यथा है बैरागढ़ निवासी लोकतंत्र सेनानी कालूराम छत्तानी की।
स्वयंसेवक होकर आपातकाल का विरोध ही अपराध
श्री छत्तानी बताते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का विरोध और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक होना हमारा सबसे बड़ा अपराध हो गया था। स्वयंसेवकों, संगठन और जनसंघ के पदाधिकारियों को उनके नाम और पते खोज-खोजकर उन पर अत्याचार किए गए और मीसा की धाराएं लगाकर उन्हें जेल में डाला गया। साल 1975 के अगस्त महीना था, जब मैं नवयुग सभा स्कूल, बैरागढ़ में पढ़ा रहा था। स्कूल में ही अचानक पुलिस पहुंची और मुझे उठाकर थाने ले गई। थाने में कई सवाल हुए, जवाब नहीं मिलने पर अमानवीय अत्याचार हुए। इसके बाद मीसा की धारा लगाकर जेल में डाल दिया गया। मीसा हटाने के बाद ही जेल से बाहर आ सका।
जेल में हम नहीं, बाहर परिवार हुआ परेशान
श्री छत्तानी बताते हैं कि मुझे 19 महीने जेल में रखा गया। इस दौरान जेल में संगठन और जनसंघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता भी थे। जेल में तो हमें किसी तरह की परेशानी नहीं हुई, दिनचर्या से लेकर नियमित शाखा, खान-पान, व्यायाम और धार्मिक प्रवचन, राष्ट्रभक्ति के प्रबोधन होते थे। लेकिन जेल से बाहर आर्थिक तंगी से जूझता मेरा परिवार बहुत परेशान हुआ। जेल में भी पुलिस परिजनों से मिलने नहीं देती थी, जमानत अथवा पैरोल मिलना आसान नहीं था। आखिर इंदिरा की सत्ता और मीसा हटने के बाद ही हम जेल से आ सके। इसके बाद फिर से कारोबार खड़ा किया और परिवार के हालात सुधरे। चार साल बाद 1980 में विवाह हुआ।
दुर्दांत अपराधियों सा व्यवहार कर रही थी पुलिस
इंदिरा गांधी के आपातकाल का विरोध इतना घोर अपराध माना गया कि पुलिस दुर्दांत अपराधियों की तरह व्यवहार कर रही थी। पुलिस जिनकी गिरफ्तारी कर रही थी, उन्हें पहले एक-दो दिन थाने में रखकर पूछताछ की जा रही थी। थाने में पुलिस ने संगठन पदाधिकारियों के नाम, पते और मीसा के खिलाफ चल रहे अभियान के भेद जानने के लिए गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को न केवल पीटा, बल्कि अमानवीय अत्याचार भी किए। हालांकि अधिकांश कार्यकर्ताओं ने अत्याचार सहकर भी मुंह नहीं खोला।
परिजन कर रहे अस्वस्थ्य छत्तानी की सेवा
74 वर्षीय श्री छत्तानी अभी अस्वस्थ हैं। उन्हें ठोस भोजन की जगह तरल आहार दिया जा रहा है। चलने-फिरने में अस्वस्थ्य हो चुके हैं। नहाने, खिलाने और नित्यक्रिया जैसी नित्यक्रिया के साथ परिजन उनकी सेवा में लगे हैं।
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