राजधानी

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सुविधा के हिसाब से अतिक्रमण चिन्हित कर रही निगम टीम

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चिन्हित ठेले-गुमटी ही उठा रहे निगम कर्मचारी, कई फुटपाथों पर वर्षों से कब्जा 

भोपाल। नगर निगम के अतिक्रमण विरोधी दस्ते हर दिन शहर में ट्रकों में सवार होकर शहर में विचरण करते देखे जा सकते हैं। हर दिन अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई भी होती है। ठेले-गुमटियां, चादर और तिरपालें जब्त की जाती हैं। लेकिन यह अतिक्रमण विरोधी अभियान निगम दस्ते की सुविधा और व्यवस्था के हिसाब से ही चल पाता है। कौन-कौन से ठेले, गुमटियां हटवानी है, किन्हें छोडक़र आगे बढऩा है, यह पहले से तय होता है।  

राजधानी में नगर गिम के अतिक्रमण विरोधी अभियान की वास्तविकता यह है कि अभियान में जितना डीजल, कर्मचारियों का वेतन खर्च किया जाता है, सरकार के खजाने के लिए उतनी वसूली तक नहीं हो पाती है। हर दिन अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही सीएम हेल्पलाइन अथवा महापौर हेल्पलाइन जैसी शिकायतों पर दिखाई जाती हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि जिन अतिक्रमणों को निगम दस्ते का संरक्षण होता है, वह किसी भी प्रकार की शिकायत के बाद भी नहीं हटता है। 

सालों से नजरअंदाज हो रहे यह अतिक्रमण

शहर में अवैध गुमटियों और फुटपाथ पर स्थायी रूप ले चुके अतिक्रमणों की संख्या हजारों में है। नए भोपाल के हर क्षेत्र में कई फुटपाथ अतिक्रमण की चपेट में है। बांसखेड़ी क्षेत्र के फुटपाथ पर चीनी मिट्टी के बर्तन बेचने वालों का लगभग डेढ़ दशक से कब्जा है। इसी सडक़ का दूसरा फुटपाथ बांस-घास का सामान बेचने वालों ने घेर लिया है। इसी तरह 10 नंबर से 12 नंबर तक, ई-7 के सामने हनुमान जी मंदिर वाली सडक़, कोलार रोड़, होशंगाबाद, बीएचईएल, एम्स, बाग सेवनियां, से ेकटारा हिल्स, लिंक रोड़-1, 2 एवं तीन, माता मंदिर, भारत माता चौराहा से भदभदा, न्यू मार्केट मार्ग और एमपी नगर जैसे प्रमुख बाजार के फुटपाथों पर भी अतिक्रमण की चपेट में हैं। मंत्रालय सहित सरकार के विभिन्न विभागों के मुख्यालय के बाहर की सडक़ों के फुटपाथ अतिक्रमण मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। 

गुमटियों में नेताओं के भी कोटे! 

राजधानी में गुमटियां और झुग्गियां बसाने में राजनेताओं का बड़ा हाथ रहा है। कुछ स्थानीय नेता-जनप्रतिनिधियों द्वारा इनसे मासिक वसूली के किस्से भी सर्वविदित हैं। मासिक वसूली के कारण ही यह राजनेता इन अवैध अतिक्रमणों पर कार्रवाई नहीं होने देते। जैसे ही निगम की अतिक्रमण विरोधी टीम कार्रवाई के लिए पहुंचती है। अतिक्रमणकारी संबंधित नेताओं से फोन पर बात कराकर टीम को वापस लौटने के लिए मजबूर करते रहे हैं। यह नेता अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में अपने कोटे के अतिक्रमण को संरक्षण देते रहे हैं।