Breaking News:

• रेखा यादव ने संभाला महिला आयोग अध्यक्ष का कार्यभार • ‘एक्टिव मोड’ में कार्य करें अधिकारी, लापरवाही पर होगी सख्त कार्रवाई, समय सीमा बैठक में कलेक्टर के निर्देश • पश्चिम बंगाल विजय पर भाजपा कार्यालय में मना उत्सव, ढोल-नगाड़ों के बीच झूमे कार्यकर्ता, प्रदेश अध्यक्ष ने मिठाई के साथ खिलाई झालमुड़ी • कौशल शर्मा ने ग्रहण किया महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष का पदभार • मोदी की झोली में बंगाल की ममता, भगवा हो गया ‘झालमुई’ का रंग, प्रधानमंत्री बोले यह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व दिन • रोटेशन नहीं ट्रांसफर हैं ये: चेकपोस्ट व्यवस्था के बाद ही जारी होगी परिवहन विभाग की चक्रानुक्रम (रोटेशन) सूची! अभी मैदानी अमले को मिलना शुरू हुई नई पदस्थापना
विशेष

Image Alt Text

जब गृहसचिव को फोन लगा खुद मुख्यमंत्री ने कराया मेरा पुलिस सत्यापन

विशेष

संस्मरण मीसा बंदी: कर्नल नारायण पारवानी

भोपाल। विद्यार्थी परिषद के नगर अध्यक्ष होने और सरकार की नीतियों के विरोध के कारण मुझे इंदिरा गांधी के आपाताल का शिकार होना पड़ा। सेना में नौकरी का प्रयास सफल तो हुआ, लेकिन पुलिस सत्यापन नहीं होने से अटक गया। पुलिस अधिकारी सत्यापन के लिए तैयार नहीं थे। तब युगधर्म के तत्कालीन संपादक राधेश्याम शर्मा, जनता पार्टी (बाद में भाजपा) के पितृपुरुष कुशाभाऊ ठाकरे के प्रयासों से नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा के आदेश पर सीधे गृह सचिव के माध्यम से पुलिस सत्यापन हो सका और सेना में नौकरी का मेरा सपना पूरा हो सका। यह कहना है 5 महीने 8 दिन मीसा बंदी के रूप में भोपाल जेल में रहे संत हिरदाराम नगर (बैरागढ़) निवासी कर्नल नारायण पारवानी का।

पारवानी बातते हैं कि पुलिस ने थाने में मारपीट तो नहीं की,लेकिन धारा 144 में गिरफ्तारी कर 24 घंटे थाने में रखा। परिजन जमानत के लिए पहुंचे तो कलेक्टर के निर्देश पर पुलिस ने मीसा की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया।  

नौकरी की आस टूटी तब हो सका पुलिस सत्यापन

नौकरी के लिए पुलिस सत्यपन का रोचक संस्मरण सुनाते हुए कर्नल पारवानी बताते हैं कि सेना में मुझ सहित एक साथ एमएसीटी (अब मैनिट) कॉलेज के चार छात्रों का चयन हुआ। तीन का ज्वाइनिंग लेटर आया,मेरा नहीं। पता किया तो पुलिस द्वारा सत्यापन नहीं किए जाने की बात सामने आई। थाने और एसपी से पता चला कि सत्यापन डीआईजी विजलेंस ने रोका है। विधायक लक्ष्मीनारायण शर्मा के हस्तक्षेप के बाद डीआईजी से मिला तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि (मीसा सहित नारायण पारवानी नाम के दूसरे व्यक्ति के अपराधिक प्रकरणों के चलते) मेरे इस कुर्सी पर रहते सत्यापन नहीं हो सकेगा। निराश होकर मित्र के घर बैठा तभी युगधर्म के तत्कालीन संपादक राधेश्याम शर्मा ने हालचल पूछा। उन्हें पूरी बात बताई तो वे अपनी कार में बैठाकर तुरंत जनता पार्टी कार्यालय ले गए और ठाकरे जी को पूरी बात बताकर नाराजगी व्यक्त की। ठकारे जी वीरेन्द्र कुमार सकलेचा द्वारा मुख्यमंत्री की शपथ लेने तक दो दिन रुकने को कहा। श्री सकलेचा मुख्यमंत्री की शपथ लेकर कार्यालय में पहुंचे ही थे कि वरिष्ठ नेता नानकराम वाधवा अपने साथ लेकर मुख्यमंत्री के पास पहुंचे। मुख्यमंत्री को पूरी बात बताई तो उन्होंने सीधे गृह सचिव को इंटरकॉम पर निर्देश दिए कि सत्यापन कल तक होना है। डीआईजी नहीं करें तो आप करें, आप नहीं कर सकते तो गृहमंत्री के नाते से स्वयं मैं हस्ताक्षर करूंगा। उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि किसी भी तरह पुलिस सत्यापन एक दिन में सेना मुख्यालय पहुंचना चाहिए। कुछ दिन बाद सेना से मेरा ज्वाइनिंग लेटर आ गया।

इस तरह घर के बाहर से हुई गिरफ्तारी

पारवानी बताते हैं कि आपातकाल के दौरान उम्र 22 वर्ष थी और बी.ई तृतीय वर्ष की परीक्षाएं चल रही थीं। 28 जुलाई 1975 पेपर देने के बाद घर पहुंचा। भोजन कर दोस्त से मिलने निकला तो घर के बाहर दो पुलिसकर्मी मिले। विद्यार्थी परिषद नगर अध्यक्ष के नाते वे पहचान के थे, इसलिए बातें करते हुए साथ चल दिए। थाना पास आते ही दोनों ने हाथ पकड़े और टीआई के पास ले गए। 24 घंटे थाने में रखा, इसके बाद मीसा की धाराएं लगाकर जेज भेज दिया। जेल में पार्टी और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के मार्गदर्शन में दिनचर्या व्यवस्थित और तनाव रहित गुजरी।

इस तरह जेल से हुई रिहाई

तत्कालीन कलेक्टर ने इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज के प्राचार्यों को पत्र लिखा कि जिन छात्रों की गारंटी वे स्वयं ले सकें, वे उन्हें जेल से रिहा कर देंगे। 6-7 अन्य छात्रों के साथ प्राचार्य ने उनकी भी गारंटी ली और 4 दिसम्बर 1975 को जेल से छूटा और इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।  

गिरफ्तारी से छूटा पेपर, जेल से उर सप्लीमेंटी

बीई की परीक्षा के बीच गिरफ्तारी होने से एक पेपर छूट गया। सप्लीमेंटी आई, जिसकी परीक्षा जेल से देनी पड़ी। हालांकि परिणाम आने पर प्रथम श्रेणी में पास हुआ। सेना और मप्र विद्युत मंडल दोनों में नौकरी के लिए चयन हुआ। परिजनों की इच्छा के विपरीत मैंने सेना को चुना।

बस कंडक्टर थे पिता, गरीबी में पले-बढ़े

कर्नल पारवानी ने बताया कि 1975 में जब आपातकाल लगा था, उस समय घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पिता बस कंडक्टर थे, उनके वेतन से ही घर खर्च चलता था। हर साल परीक्षा के बाद ट्यूशन पढ़ाकर मैं पढ़ाई का खर्च जुटाता था। मेरे जेल जाने के बाद बुजुर्ग माता-पिता परेशान थे। दो दिन के बाद कलेक्टर 15 दिन में एक बार जेल में मिलने की अनुमति देते थे।