राजधानी

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परिवार पर आफत बनकर टूटी आपातकाल की गिरफ्तारी

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आपातकाल संस्मरण : श्रीमती संतोष पोरवाल अर्धांगिनी स्व. मांगीलाल पोरवाल

भोपाल। आपातकाल के समय घर में मेरे पति ही अकेले कमाने वाले थे। ऐसे में मीसा में गिरफ्तारी और 19 महीने जेल हम पर कहर बनकर टूटे। आर्थिक तंगी इतनी की बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था करना भी मुस्किल हो गया था। 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपाताकाल की आपदा का संस्मरण सुनते हुए लोकतंत्र सेनानी स्व. मांगीलाल पोरवाल की पत्नी श्रीमती संतोष पोरवाल बताती हैं कि अपने कुछ निकट संबंधियों और रिस्तेदारों के सहयोग और स्वयंसेवकों के संबल और सहयोग से जीवन का वह सबसे कष्टप्रद  समय गुजरा। जो न केवल आर्थिक कष्टों वाला था, बल्कि मीसा बंदियों से अधिक मानसिक यातनाएं उनके परिवारों को देने वाला था।  

भोजन के बीच से उठा ले गए पुलिसवाले

श्रीमती पोरवाल बताती हैं कि स्व. श्री पोरवाल एकाउंटेंट की प्रायवेट नौकरी करते थे। नियमित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाते थे। संघ के कुछ दायित्व भी थे। आपातकाल लागू होने के बाद पोरवाल जी घर पर भोजन कर रहे थे, अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। खोलकर देखा तो बाहर पुलिस वाले खड़े थे। भोजन करते से उन्हें उठाकर अपने साथ पहले थाने ले गए, फिर मीसा की धाराएं लगाकर 19 महीने तक जेल में रखा। तीन महीने तक परिवार को यह तक पता नहीं चला कि वे किस जेल में बंद हैं। ्रसिर्फ एक बार कलेक्टर ने उनसे जेल से मिलने की अनुमति दी।

जन्म के आठ महीने बाद देख सके बेटे का चेहरा

श्रीमती पोरवाल बताती हैं कि जिस समय स्व. पोरवाल की मीसा में गिरफ्तारी हुई। उनकी दो बेटियां थीं, गर्भस्थ शिशु के रूप में बेटे का जन्म नहीं हुआ था। जब स्व. पोरवाल मीसा में जेल पहुंच चुके थे, तब बेटे का जन्म हुआ। बेटे की जन्म की खबर भी उनके पास कई दिनों बाद पहुंची। लगभग छह आठ महीने बाद जब दो दिन का पेरोल मिला, तब उन्होंने पहली बार इकलौते बेटे (दीपक पोरवाल) का चेहरा देखा।

सेठ जी और मकान मालिक ने भी किया सहयोग

श्रीमती पोरवाल के अनुसार समाज में आपातकाल के प्रति इतना आक्रोश था कि छुपकर हर कोई मीसा बंदियों का सहयेाग करना चाहता था। घोड़ा नक्कास स्थित जिन छन्नूलाल अहीर के मकान में रहते थे, उन्होंने 19 महीने तक उनसे किराया नहीं मांगा। जिन सेठ सोडानी जी के यहां नौकरी करते थे, समय-समय पर वे भी सहयोग करते रहे।

स्वयंसेवकों के प्रति अधिकारियों में था अटूट विश्वास

श्रीमती पोरवाल ने बताया कि आपातकाल में गिरफ्तार स्वयंसेवकों को  यदि कोई काम होता था और पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों से काम निपटाकर वापस लौटने की अनुमति मांगते, तो अधिकारी अधीनस्थों को यह कहकर छोडऩे आदेश तुरंत देते थे कि संघ का स्वयंसेवक है, इसलिए अनुशासन और वचनबद्ध है।अगर वापस आने कहा है तो जरूर आएगा और निर्धारित समय पर आएगा। इस तरह स्वयंसेवकों के प्रति अधिकारियों का अटूट विश्वास था।

संगठन और सरकार में भी रहे दायित्व

स्व. पोरवाल लम्बे समय तक भारतीय किसान संघ में प्रदेश महामंत्री और प्रदेश अध्यक्ष जैसे दायित्वों में रहे। 2003 में मप्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें श्रमिक कल्याण बोर्ड में चेयरमैन बनाया गया। हालांकि वे इस पद पर कुल 13 महीने ही रहे। संघटन के काम के लिए ्रआदेश मिलते ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया था। स्व. पोरवाल के पुत्र दीपक पोरवाल भी भोपाल में संघ के दायित्ववान कार्यकर्ता हैं।