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खबर का असर, मप्र विधानसभा ने सुधारी गलती : मुख्यमंत्री नहीं, लेकिन सदन की नेता रहीं विजयाराजे सिंधिया
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भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा की वेबसाइट पर स्व. विजयाराजे सिंधिया को मध्यप्रदेश की भूतपूर्व मुख्यमंत्री बताने वाली अपनी गलती में सुधार कर दिया है। खबर प्रकाशित होने के बाद वेबसाइट में सुधार कर स्व. श्रीमती सिंधिया के जीवन परिचय में भूतपूर्व मुख्यमंत्री के स्थान पर भूतपूर्व सदन की नेता जोड़ दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि 25 अक्टूबर को हिडन पिक्चर न्यूज पर मप्र की विधानसभा की वेबसाइट पर अपलोड गलत जानकारी का समाचार दिया गया था। विधानसभा की वेबसाइट पर 1 नवम्बर 1956 से अब तक के मुख्यमंत्रियों/सदन के नेताओं की सूची प्रदर्शित की गई है। इस सूची में अब तक के सभी 28 मुख्यमंत्रियों और पांचवें स्थान पर सदन के नेता के रूप में श्रीमती विजयाराजे सिंधिया का नाम है। लेकिन संशोधन से पूर्व उनके जीवन परिचय में उन्हें मप्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री बताया गया। इसके बाद विधानसभा के प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा के निर्देश पर वेबसाइट पर इस गलती को सुधार दिया गया।
एक मात्र सदन की नेता, जिन्होंने त्यागा मुख्यमंत्री पद
मप्र विधानसभा के इतिहास में स्व. विजयाराजे सिंधिया एक मात्र ऐसी सदन की नेता रहीं हैं, जिन्होंने स्वयं ही मुख्यमंत्री पद त्यागा। संविद सरकार बनने पर वे सदन की नेता चुनी गई थीं। सदन का नेता ही सामान्यत: मुख्यमंत्री बनाया जाता है। लेकिन उन्होंने स्वयं मुख्यमंत्री पद त्यागा और विधानसभा में सदन की नेता के रूप में मुक्त रहकर जनसेवा करना स्वीकार किया। 30 जुलाई 1967 से 25 मार्च 1969 तक श्रीमती सिंधिया सदन की नेता तो बनी रहीं, लेकिन 30 जुलाई 1967 से 12 मार्च 1969 तक मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह रहे। इसके पहले और बाद में कभी सदन का नेता और मुख्यमंत्री अलग-अलग नहीं रहे।
कांग्रेस छोडक़र भी चुनाव जीतीं थीं श्रीमती सिंधिया
श्रीमती सिंधिया सन् 1957, 1962 और 1967 के आम चुनावों में लोक सभा के लिए चुनी गईं। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों से नाराज श्रीमती सिंधिया ने सन् 1967 में कांग्रेस छोड़, एक साथ लोक सभा और राज्य विधान सभा का चुनाव लड़ा। वे दोनों ही चुनावों में जीतीं। इसके बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता त्यागकर राज्य विधान सभा की सदस्यता ली। चुनाव के बाद 6 माह के अंदर उनके प्रयासों से सत्तारूढ़ कांग्रेस का पतन हुआ तथा संविद सरकार बनी। उन्होंने मुख्यमंत्री पद स्वीकार नहीं किया, बल्कि संविद की एकता और मुक्त रहकर जनसेवा कार्य ही स्वीकार किया।
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