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राजधानी

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कैसे पूरा होगा भिखारी मुक्त राजधानी का सपना? ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से पहले सख्ती से चला था अभियान, अब भूल गए अधिकारी

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भोपाल। पिछले साल 25-25 फरवरी को राजधानी भोपाल में आयोजित हुए ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से पहले राजधानी में चलाया गया भिखारी मुक्त शहर अभियान विगत 3 महीनों से कहीं नजर नहीं आ रहा है। शहर की सडक़ों, धार्मिक स्थलों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर भिखारी लोगों को परेशान करते, भीख मांगते नजर आ रहे हैं। वहीं शहर की सडक़ों पर पेन-पेंसिल, खिलौने, गुव्वारे, चाबी के गुच्छे, कान की सफाई के लिए ईयरबड सहित अन्य समान भी बेचा जा रहा है। 

उल्लेखनीय है कि इंदौर में हुई भिखारी मुक्त शहर की पहल को राजधानी भोपाल में अपनाते हुए कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह ने जिले में भिक्षावृत्ति पर रोक लगाते हुए भीख देने और मांगने वालों पर कार्रवाई हेतु आदेश जारी किया था। पिछले साल फरवरी में राजधानी में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से पहले अभियान तेजी से चला था। बड़ी संख्या में भिक्षावृत्ति करने वाले निराश्रित लोगों को पकडक़र आश्रय गृहों में छोड़ा गया, जबकि कई लोगों को समझाइश देकर उनके घर भेजा गया। समिट के बाद धीरे-धीरे अभियान धीमा पड़ता गया और अक्टूबर 2025 के बाद से राजधानी में यह अभियान कहीं नजर नहीं आया। कलेक्टर ने भिक्षावृत्ति निषेध आदेश में सडक़ों और चौराहों पर घूमकर सामान बेचने वालों पर भी प्रतिबंध लगाया था। कुछ लोगों पर कार्रवाई भी हुई, उनका सामान जब्त भी किया गया था। लेकिन अब अधिकांश व्यस्ततम चौराहों पर लोग खिलौने एवं अन्य सामान बेचते देखे जा सकते हैं।  

भीख देने वालों पर भी नहीं हो रही कार्रवाई 

भिक्षावृत्ति रोकने के लिए भीख देने वालों के विरुद्ध भी कार्रवाई के निर्देश कलेक्टर ने दिए थे। भिक्षावृत्ति पर रोक लगाने की जिम्मेदारी कलेक्टर ने अनुविभागीय अधिकारियों (एसडीएम) को सौपी थी। तीन महीने पहले तक कभी-कभी कार्रवाई होती रही, लेकिन अब यह पूरी तरह बंद है। धार्मिक स्थलों के बाहर बड़ी सख्या में भिखारी बैठे, दर्शनार्थियों से भीख मांगते नजर आ रहे हैं। मंदिरों-सडक़ों पर लोग स्वयं भी भिक्षा देने के लिए आ रहे हैं, लेकिन न तो भिक्षा मांगने वालों पर कार्रवाई हो रही है और न ही देने वालों पर।

फुटपाथ और मंदिरों के आसपास भिखारियों के ठिकाने  

बेसहारा और बेघर लोगों के लिए शहर में रैन बसेरे बने हैं। सर्दी के मौसम में रैन-बसेरे सभी को याद आते हैं। लेकिन भिक्षावृत्ति करने वाले इन रैन बसेरों में नहीं, कड़ाके की सर्दी में भी ये शहर के फुटपाथों अथवा रात में बंद हो चुके मार्केट की इमारतों में कंबल ओढक़र रात गुजारते हैं। सुबह होते ही ये भिक्षा मांगने निकल जाते हैं।