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Gossip गुगली

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Hidden Picture's Gossip गुगली। रिटायर आरटीआई के टू सीआर पानी में,.....उदास और हताश नजर आ रहे पंजा दल के कार्यकर्ता

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 रिटायर आरटीआई के टू सीआर पानी में! 

Gossip गुगली। खुद को होशियारी की पाठशाला समझने वाले रिटायर आरटीआई को पुराने कटर से गच्चा दे दिया। दो दशक पहले इस आरटीआई ने दलाल के साथ मिलकर ग्वालियर में भगवान श्रीकृष्ण के नाम पर उच्च शिक्षा की दुकान खोली थी।प्रयास था कि नयागांव,मालथौन सहित कई चैकपोस्टों से समेटी गई काली कमाई सफेद होगी। इसके लिए भिण्ड वाले पूर्व नेता प्रतिपक्ष की जमीन पर खोली गई उच्च शिक्षा की पाठशाला में परिवहन के पूर्व आरटीआई ने स्वयं, पत्नी और हनुमान चौराहा वाली महिला मित्र के नाम पर 2 सीआर का इन्वेस्टमेंट किया। आरटीआई के रिस्तेदार आरटीओ के बाबू ने भी आधा सीआर भी पाठशाला में इन्वेस्ट कर दिया। कुछ दिन ठीक-ठाक चला, लेकिन एक ढेला भी प्रोफिट निकलकर नहीं आया। इस पर कलेश शुरू हुआ तो दुकान का गल्ला संभाले कटर ने साफ कर दिया कि दुकान घाटे में है। कलह ज्यादा बढ़ा तो कटर ने यह भी साफ कर दिया कि एक नंबर में 5 और 10 एल का जो भी इन्वेस्टमेंट दस्तावेजों में दर्ज है। वो लें और दुकान से फुर्सत हों। आखिर कटर और आरटीआई ने संस्था सदस्य परिजनों - दोस्तों के माध्यम से दो अलग-अलग संस्थाएं बनाकर कोर्ट में मालिकाना हक चेलेंज किया। लेकिन आरटीआई को अंत में ठेंगा ही मिला। एक दशक पहले शिक्षा की इस दुकान पर ताला लग चुका है और करोड़ों की बिल्डिंग सहित पूरी संपत्ति इस पुराने कटर के कब्जे में है। बता दें कि ये प्रदेश मुख्यालय वाला वही कटर है जो तीन टीसी के भी बिना डकार लिए करोड़ों पचा चुका है।


उदास और हताश नजर आ रहे पंजा दल का कार्यकर्ता

एमपी के पंजा दल का कार्यकर्ता पूरी तरह सुस्त, उदास और हताश नजर आ  रहा हैं। हाल में राजधानी में सूबा सदर द्वारा बुलाई गई प्रशिक्षण बैठक में कार्यकर्ता को रीचार्ज करने के प्रयास जरूर हुए, लेकिन यह सिर्फ भाषण और आश्वासनों तक ही सिमटकर रह गया। पंजादल कार्यकर्ता अब तक तो केवल राष्ट्रीय मुखिया की हरकतों से परेशान था, अब सूबे के मुखिया की चालाकियों से परेशान है। बीते महीने मुख्यालय में हुई बैठक में उखड़े युवा कार्यकर्ताओं ने सूबा सदर को साफ-साफ शब्दों में उनकी ओछी राजनीति का आईना दिखा दिया था। काम तो कुणाल के होते हैं, हमसे मिलते तक नहीं। ऐसी स्थिति में कार्यकर्ता उदास, हताश नहीं होगा तो क्या होगा? कार्यकर्ता को समझ नहीं आ रहा है कि वे किसे नेता मानें, दिग्गी की अलग दुकान सजी है, जीतू को नाथ का साथ भी मिल नहीं रहा है। तनखा बकालात से फुरसत नहीं, भूरिया बेटे को कमान सौंपकर गायब हैं।पचौरी कमल के फूल पर विराज गए। ऐसे में कार्यकर्ता किसके पास जाए। वो भी तब जब सत्ता में बैठी भाजपा चुनावी मौसम की तरह हर दिन कार्यकर्ता को एक्टिव किए है।