अपराध

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40 साल पहले पैसे लिए, अब तक नहीं दिए प्लॉट, भोपाल की हिलटॉप सोसाइटी के पदाधिकारियों के विरुद्ध ईओडब्ल्यू ने दर्ज किया प्रकरण

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भोपाल। अपना घर बनाने का सपना दिखाकर सैकड़ों लोगों से करोड़ों रुपये जुटाने और चार दशक बीत जाने के बाद भी उन्हें उनके अपने भूखंडों पर कब्जा न देने के एक मामले में आर्थिक अपराध शाखा, ने हिलटॉप गृह निर्माण सहकारी संस्था(मर्यादित), भोपाल के पदाधिकारियों केविरुद्ध धोखाधड़ी का अपराध पंजीबद्ध किया है। शिकायतकर्ता नरेन्द्र नाथानी तथा इससे जुड़ी कई अन्य शिकायतों पर ईओडब्ल्यू द्वारा कीगई विस्तृत जाँच में पता चला कि संस्था के पदाधिकारियों ने सदस्यों से भूखंडों की पूरी कीमत और विकास के नाम पर अलग से राशि लेने के बावजूद उन्हें वर्षों तक कब्जा नहीं दिया, असली विक्रय पत्र अपने पास रखकर सदस्यों को केवल फोटो कॉपी थमाई, और भूखंड आवंटन सूची में हेराफेरी की।

इन पदाधिकारियों पर हुई एफआईआर संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष सत्येन्द्र अग्रवाल, वर्तमान अध्यक्ष श्रीमतीअनीता सिंह तथा अन्य के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 एवं 120बी के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया है। 

पंजीयनकर्ता तहसीलदार ही बन गए संस्था के अध्यक्ष 

यह प्रकरण वर्ष 1986 का है। हिलटॉप गृह निर्माण सहकारी संस्था का पंजीयन 11 दिसम्बर 1986 को हुआ था।संस्था का गठन उस समय राजस्व विभाग में पदस्थ अधिकारियों ने किया, जिनमें तत्कालीन तहसीलदार सत्येन्द्र अग्रवाल भी शामिल थे, जो आगे चलकर संस्था के अध्यक्ष रहे। शुरुआत में करीब 200 से 250 लोगों को सदस्यता दी गई और उनसे भूखंड देने के नाम पर लगभग 3 से 4 करोड ़रुपये जुटाए गए। इस राशि से कोटरा सुल्तानाबाद, बरखेड़ी खुर्द, बावडिया कलां और प्रेमपुरा में जमीन खरीदी गई। ताकि उस पर कॉलोनी काटकर सदस्यों को प्लॉट दिए जा सकें। जांच में पता चला कि संस्था ने सदस्यों से भूखंड की पूरी कीमत और समय-समय पर विकास शुल्क लेकर उनके नाम विक्रय पत्र (रजिस्ट्री) तो करा दी, लेकिन रजिस्ट्री के लगभग 40 वर्ष बाद आज तक कई सदस्यों को उनके अपने भूखंड पर कब्जा नहीं दिया गया। हर बार उन्हें यह करकर टाल दिया गया कि उस जमीन पर अदालती वाद चल रहा है।  संस्था के सदस्यों को असली विक्रय पत्र न देकर केवल उसकी फोटोकॉपी दी गई और मूल दस्तावेज अपने पास रख लिए गए। इसकी आड़ में आगे चलकर सोसायटी में फेरबदल किया गया। जांच में पाया कि ऑडिट के अनुसार संस्था ने करीब 25 एकड़ भूमि लगभग 23 लाख रुपये में खरीदी तथा 30 एकड़ और भूमि के लिए लगभग 12 लाख रुपये अग्रिम के रूप में चुकाए। इतनी भूमि उपलब्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में सदस्यों को उनके भूखंड नहीं सौंपे गए। 

पदाधिकारियों ने इस तरह भी की हेराफेरी 

जांच में पाया कि जिस खसरा क्र. 261ग की भमि पर कई सदस्यों के नाम भूखंड पंजीकृत किए गए, उसका एक हिस्सा 1 जुलाई 2003 को म.प्र. गृह निर्माण मंडल द्वाराअधिग्रहितकर लिया गया था। इसके बावजूद सदस्यों को भूखंड के नाम पर राशि ली जाती रही।  एक सदस्य के नाम कोटरा सुल्तानाबाद के खसरा क्रमांक 262/263 में भूखंड क्रमांक 177 की रजिस्ट्री 22 मई1993 को की गई थी, लेकिन वर्ष 2023-24 की आवंटन सूची में वही भूखंड 178 दिखा दिया गया और भूखंड क्र. 177 किसी अन्य व्यक्ति के नाम चढ़ा दिया गया। खसरा क्रमांक 261ग के भूखंड क्रमांक 5 की रजिस्ट्री एक सदस्य के नाम 31 जनवरी 1995 को की गई, और इस भूखंड की कीमत 21,000 रुपये होने के बावजूद कुल 90,000 रुपये वसूले गए। बाद में आवंटन सूची में वही भूखंड किसी दूसरे सदस्य के नाम दिखा दिया गया, और सदस्यता क्रक्रमांक 509 भी किसी तीसरे व्यक्ति के नाम दर्ज कर दिया गया। इसी तरह अन्य सदस्यों केसाथ भी हुआ।इस तरह सोसायटी की भूखंड आवंटन सूची में सोची-समझी हेराफेरी की गई।