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एनसीआईएसएम की सख्ती, फर्जी शिक्षक दिखाए तो 25 लाख का अर्थदण्ड, खतरे में पड़ सकती है 200 से ज्यादा आयुर्वेद-यूनानी कॉलेजों की मान्यता
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भोपाल। मध्यप्रदेश सहित देशभर के आयुर्वेद,सिद्धा, यूनानी- एएसयू आयुष मेडिकल कॉलेजों पर सख्ती के साथ सत्र 2026-27 से दण्डात्मक नीति लागू कर दी है। इस आशय का परिपत्र भारतीय चिकित्सा पद्याति राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईएमएस बोर्ड) की 160 वीं बैठक के बाद आयोग के अध्यक्ष डॉ मुकुल पटेल ने जारी किया है। इस परिपत्र के जारी होने से मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात, बिहार, उत्तराखण्ड, नई दिल्ली, हरियाणा, छत्तीसगढ़, पंजाब, महाराष्ट्र समेत देशभर के 700 में से 200 से ज्यादा एएसयू महाविद्यालयों की मान्यता 2026-27 में खतरे में पड़ सकती है अथवा इनकी यूजी सीटें कम हो सकती हैं। परिपत्र के अनुसार संस्थान में अगर शिक्षक, गैर शिक्षक एवं छात्रावास स्टाफ की उपस्थिति के लिए एईबीएएस आइरिस सिस्टम नहीं होगा तो इस निरीक्षण सत्र की मान्यता भी रद्द हो सकती है। महाविद्यालयों द्वारा निरीक्षण कराने से मना करने पर कॉलेज की वर्तमान सत्र के लिए अनुमति-मान्यता रद्द कर दी जाएगी। अगर शिक्षक (फैकल्टी) सिर्फ कागजों (ऑप पेपर) पर पाया गया तो प्रति शिक्षक 25 लाख का अर्थदण्ड तथा शिक्षक को एक वर्ष के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। अगर शिक्षक लगातार तीन वर्षों तक ऑन पेपर पाया गया तो हमेशा के लिए उसका शिक्षक कोड स्थाई रूप से रद्द कर दिया जाएगा। प्रत्येक अपर्याप्त शिक्षण संकाय की कमी पर कुल मान्य सीटों में से 5 सीटों की कमी कर दी जाएगी। अस्पताल के संचालन में लापरवाही पर सीटों की संख्या में तीस फीसदी तक कटौती करने पर विचार हो सकता है। जिस प्रकार से देशभर के आयुर्वेद - एएसयू आयुष महाविद्यालयों में शिक्षक स्टॉफ की कमी है और मापदण्डों में लापरवाही हो रही है उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि देशभर के 200 से ज्यादा आयुष महाविद्यालयों की मान्यता खतरे में पड़ सकती है। वर्तमान में प्रदेश समेत देशभर में आयुर्वेद, सिद्धा , यूनानी के 700 से ज्यादा महाविद्यालय हैं, जिनमें दो लाख से ज्यादा छात्र अध्ययनरत हैं। मापदण्डों का पालन शासकीय व निजी दोनों संस्थानों पर एक समान लागू होगा। आयुष मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. राकेश पाण्डेय का कहना है कि इस दण्डात्मक नीति का स्वागत है, परंतु प्रदेश समेत देशभर के आयुष कॉलेजे शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। एनसीआईएसएम व आयुष मंत्रालय को मापदण्डों में 10 से 20 फीसदी का चयन देने पर विचार करना चाहिये।
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