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आध्यात्म
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा शंकर व्याख्यान माला आयोजित
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साधन नहीं अपितु दृष्टि के प्रबुद्ध होने की समझ है वेदांत: मां पूर्णप्रज्ञा
भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा अद्वैत वेदांत के लोकव्यापीकरण के लिए प्रति माह आयोजित होने वाली शंकर व्याख्यानमाला के 77वें संस्करण का आयोजन एवं ऑनलाइन प्रसारण किया गया। इस व्याख्यानमाला में विश्वभर से प्रतिष्ठित आर्ष मनीषी एवं चिंतक अद्वैत वेदांत के गूढ़ विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत कर साधकों का मार्गदर्शन करते हैं।
रविवार, 30 मार्च को आयोजित शंकर व्याख्यानमाला के नवीनतम संस्करण में अद्वैत भावधारा की विदुषी श्री श्री माँ पूर्णप्रज्ञा ने अजातवाद सिद्धांत पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि वेदांत कोई साधन नहीं, बल्कि दृष्टि के प्रबुद्ध होने की समझ है। अजातवाद वह अवस्था है जहां शास्त्रीय, लौकिक एवं भौतिक व्यवहारों का किंचित भी स्पर्श नहीं होता। वेदांत की मूल प्रक्रिया दो चरणों में संपन्न होती है-अध्यारोप एवं अपवाद और अजातवाद इन सभी प्रक्रियाओं का पूर्ण निषेध करता है।
बुद्धि के प्रबुद्ध होने की स्थिति अजातवाद
मां पूर्णप्रज्ञा ने कहा कि अजातवाद एक ऐसी स्थिति की यात्रा है, जहाँ कर्म, भोग, सृष्टि, साधना, जीव, ईश्वर एवं समष्टि भी नहीं होते। बुद्धि के अत्यंत सूक्ष्म एवं प्रबुद्ध होने पर ही इस स्थिति की प्राप्ति संभव है। अजातवाद ही सृष्टि के मिथ्यात्व का निश्चय करता है, और प्रत्येक अध्यारोप का एक अपवाद अवश्य होता है। जब कोई इस निश्चय में दृढ़ हो जाता है, तभी उसमें निष्ठा उत्पन्न होती है। उन्होंने अपने व्याख्यान में उन्होंने आचार्य शंकर के दादागुरु गौड़पादाचार्य द्वारा प्रतिपादित मांडूक्य कारिकाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अजातवाद ज्ञान और समझ का विषय है, जिसे प्राप्त करने के लिए केवल श्रवण ही पर्याप्त है। अंत में उन्होंने कहा कि अजातवाद सुधा है, अमृत है, रस है। इसे जानने के बाद कोई वासना शेष नहीं रहती, क्योंकि जहाँ कोई भेद ही नहीं, वहाँ वासना का भी कोई स्थान नहीं।
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