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आध्यात्म

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मन एवं इन्द्रियों का विषय नहीं है ब्रह्मविद्या: स्वामी परमानंद गिरि

आध्यात्म

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास ने आयोजित किया प्रेरणा संवाद ‘अद्वैतामृतम्’ 

भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग द्वारा न्यास के विस्तारित नूतन परिसर ‘एकात्म धाम’ भोपाल में महामंडलेश्वर युगपुरुष स्वामी परमानंद गिरि महाराज (न्यासी, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र, अयोध्या) की गरिमामय सन्निधि में प्रेरणा संवाद ‘अद्वैतामृतम्’ का आयोजन किया। कार्यक्रम में भोपाल शहर के प्रबुद्धजन, साधु-संत एवं बड़ी संख्या में शंकरदूत उपस्थित रहे।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के न्यासी, युगपुरुष महामंडलेश्वर परमानंद गिरि ने वेदांत और उपनिषदों की गूढ़ व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा, ‘सदा रहने वाला ब्रह्म मैं हूँ, पंचभूतों का यह जगत मैं नहीं हूँ। जो सभी अवस्थाओं में प्राप्त है, वही ध्यान करने योग्य है।’ उन्होंने कहा कि भय का मूल कारण देहात्मबुद्धि है। चिंता या भय से मुक्त होना है तो हमें यह पहचानना होगा कि ‘मैं कौन हूँ?’ मैं मन, बुद्धि या शरीर नहीं हूँ। आत्मा सदैव भयमुक्त है। गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं है; ज्ञान के लिए गुरु की कृपा एवं सान्निध्य आवश्यक है। उन्होंने कहा, आचार्य शंकर ने परंपरा से जुडक़र सत्य की खोज की। जब तक चित्त की वृत्तियों का निरोध नहीं होगा, तब तक सत्य की खोज संभव नहीं है। ब्रह्मविद्या मन एवं इन्द्रियों का विषय नहीं है।

ज्ञान से ही मुक्ति संभव 

स्वामी परमानंद गिरि ने कहा, ‘ज्ञान से ही मुक्ति संभव है, कर्म केवल शुद्धि का साधन है। भक्ति और उपासना अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि आत्मज्ञान तक पहुँचने के माध्यम हैं। किसी वस्तु का वास्तविकता में न होकर प्रतीत होना अध्यास है, और यह अध्यास केवल ज्ञान के प्रकाश से समाप्त होता है।’ उन्होंने अद्वैत वेदांत को न केवल दर्शन, बल्कि मानवता को मार्गदर्शन देने वाला एक जीवंत सिद्धांत बताया। उन्होंने कहा, ‘प्रक्रिया में द्वैत स्वीकार्य हो सकता है, किंतु प्रक्रिया की पूर्णता अद्वैत में ही है।’ उन्होंने गुरुवाणी एवं रामचरितमानस से भी अद्वैत वेदांत की प्रासंगिकता को समझाया।

चैतन्य स्वरूप की अनुभूति ही वास्तविक आत्मज्ञान

स्वामी जी ने कहा, जो दिखता है, वह सत्य नहीं है और जो सत्य है, वह इन आँखों से नहीं दिखता। इस सत्य को समझने और जानने के लिए हमें अंतर्मुखी होना आवश्यक है। चित्त की शुद्धि के लिए भक्ति एवं एकाग्रता के लिए ध्यान जरुरी है। ज्ञान से ही अज्ञान की निवृत्ति संभव है, परन्तु बुद्धिगत ज्ञान पर्याप्त नहीं है; अनुभव आधारित ज्ञान होना चाहिए। मन, बुद्धि और अहंकार से परे जाकर चैतन्य स्वरूप की अनुभूति ही वास्तविक आत्मज्ञान है। सतत् वेदांत श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन से हम इस चैतन्य स्वरूप की अनुभूति तक पहुँचेंगे।

सतत वेदांत अध्ययन का केंद्र ‘एकात्म धाम’

74 बंगला स्थित न्यास के विस्तारित नवीन परिसर ‘एकात्म धाम’ में आगामी समय में अद्वैत वेदांत पर केंद्रित नियमित गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी। एकात्म धाम परिसर राजधानी में सतत वेदांत अध्ययन केंद्र के रूप में कार्य करेगा, जहाँ समय-समय पर योग, ध्यान एवं वेदांत पर सत्र आयोजित होंगे। संवाद में विशेष रूप से महामंडलेश्वर ज्योतिर्मानंद गिरि, स्वामी नित्यज्ञानानंद, स्वामी गुरुकृपानंद, सांची विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री, कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ सहित बड़ी संख्या में युवा उपस्थित रहे।