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स्कूल छूटा, मित्र मंडली बिछड़ी फिर भी अटल संकल्प से नहीं डिगा लोकतंत्र का यह मासूम प्रहरी
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आपातकाल की आपबीती- संतोष शर्मा
भोपाल। इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के खिलाफ राष्ट्रवादियों और लोकतंत्र सेनानियों ने ऐसी अलग जगाई कि युवा, बच्चे, बुजुर्ग सभी लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन के मौदान में नजर आने लगे। पुलिस अत्याचारों के बीच लोकतंत्र की रक्षा के इस समर में अंतिम जीत तो राष्ट्रवादियों की ही हुई। लेकिन आंदोलनकारियों और उनके परिजनों को अपना बहुत कुछ खोना पड़ा।
217/2-सी, सकेत नगर, भोपाल निवासी लोकतंत्र सेनानी संतोष शर्मा बताते हैं कि बी.एच.ई.एल, भोपाल में कार्यरत एवं भारतीय मजदूर संघ के पदाधिकारी उनके पिता शंकरलाल शर्मा लोकतंत्र सेनानियों और उनके परिजनों की सेवा में जुटे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा और पिता के मार्गदर्शन में उन्होंने भी लोकतंत्र को आपातकाल की बेडियों से मुक्त कराने के लिए इस समर में आहूति का संकल्प लिया। उस समय उम्र कुल साढ़े 14 साल की थी। परिजनों से अनुमति ली और साथियों सुरेश गुप्ता, अशोक गर्ग, शंभू सोनकिया, चन्द्रभान यादव, रमेश सिंह के साथ मिलकर इंदिरा गांधी के खिलाफ चौक भोपाल में 20 जनवरी 1976 को जेल भरो आंदोलन शुरू किया। पुलिस ने गिरफ्तारी की। उम्र कुल साढ़े 14 साल थी, शरीर इतना दुबला-पतला कि पुलिस की बेडियां हाथों से निकल भागीं। कम आयु के चलते पुलिस मीसा की धाराएं तो नहीं लगा सकी। लेकिन प्रतिबंधात्मक धारा 151 और भारतीय सुरक्षा अधिनियम (डीआईआर) में जरूर बंदी रहे। हालांकि पुलिस प्रताडऩा और डंडों की मार से फिर भी नहीं बच सके।
कपड़े उतारकर पीटती पुलिस
केन्द्रीय जेल भोपाल में बंद रहने के दौरान पुलिस अधिकारियों ने बर्बर व्यवहार किया। गरम कपड़े उतरवाकर बैरिकों में बंद किया तो सभी ने दंड बैठक, सूर्य नमस्कार और व्यायाम से शरीर में गर्मी लाते रहे। पुलिस ने सभी आंदोलनकारियों की कपड़े उतारकर डंडों से पिटाई करते हुए पूछताछ की। सभी को लगभग 100-150 तक डंडे मारे। जैसे ही बारी साढ़े 14 साल के दुबल-पतले संतोष कुमार शर्मा की आई टीआई ने धमकाकर पूछताछ की और दर्जनभर डंडे मारकर छोड़ दिया। कम उम्र के कारण संघ के तत्कालीन प्रांत कार्यवाह उत्तमचंद इसराणी ने अधिवक्ता सीताराम यादव से कहकर सभी की जमारत करा दी और 8 मार्च 1976 को जेल से छूटे।
जेल से छूटकर की आंदोलनकारियों की सेवा
संतोष शर्मा बताते हैं कि जेल से छूटने के बाद भी संघर्ष जारी रहा। पिताजी भारतीय मजदूर संघ के पदाधिकारी थे। उस समय वे विचारधारा के लोगों से धन संग्रह कर मीसाबंदी परिवारों को आर्थिक सहयोग पहुंचाते थे। संघ के कार्यकर्ता छोंकरजी की आटा चक्की थी, वहां जो आटा इक_ा होता था, मैं उसे जेल में बंद मीसाबंदियों के परिवारों के पास पहुंचाने सहित दूसरे काम करता था। जेल में बीमार होकर हमीदिया अस्पताल में उपचार के लिए पहुंचे तपन भौमिक और हशमत उल्ला वारसी की देखरेख और सेवा की। हालांकि उपचार के अभाव में बारसी की मृत्यु हो गई थी।
स्कूल से नाम कटा, मित्रों से काटी कन्नी
जेल से छूटने के बाद स्कूल पहुंचे तो पता चला कि उनका नाम काट दिया गया है। दूसरे स्कूल भी प्रवेश देने के लिए तैयार नहीं थे। आपातकाल के हालातों को देखकर मित्र मंडली ने भी उनसे दूरी बना ली थी। आपातकाल हटने के बाद पुन: प्रवेश की अनुमति तो मिली, लेकिन 9वीं कक्षा में और सभी साथी 11वीं कक्षा में पहुंच चुके थे। 9वीं में पढऩे को राजी नहीं होने पर श्री शर्मा को गणित-विज्ञान विषय छोडक़र कला विषय में ग्यारहवीं की परीक्षा दिलाई गई। डीआरआई के प्रकरण में मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी, भोपाल ने प्रकरण को समाप्त किया।
14 महीने देरी से जारी हो सका पदस्थापना आदेश
1987 में शासकीय सेवा में आने के से पहले कराए गए पुलिस चरित्र सत्यापन में पुलिस ने आपातकाल में बंद होने के कारण शासकीय सेवा के योग्य नहीं माना। प्रशासनिक प्रयासों के साथ उच्च न्यायालय में अपील की। 15 अगस्त 1988 को तत्कालीन क्षेत्रीय विधायक बाबूलाल गौर के आग्रह पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सहृदयता दिखाते गृह विभाग से नस्ती मंगाकर एक माह में टिप्पणी को अयोग्य से योग्य कराया। हालांकि इसके चलते शासकीय सेवा में पदस्थापना 14 महीने बिलंब से हुई। इस कारण 450 साथी कर्मचारियों से कनिष्ठ होना पड़ा।
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