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50 साल बाद भी दर्द देते हैं मीसा में पड़े डंडे
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आपातकाल में अत्याचारों के चरम पर रही पुलिस यातना
भोपाल। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल अत्याचारों की पराकाष्ठा था। आपातकाल का विरोध करने वाले जेलों में ही नहीं ठूंसे गए, अमानवीय अत्याचार भी हुए। मुझे मुख्यमंत्री की सभा के बीच आपातकाल के विरोध में नारेबाजी पर 27 दिसम्बर 1975 को गिरफ्तार गया। कड़ाके की ठंड में पुलिस की पिटाई का दर्द आज भी शरीर में मौजूद है। कमर आज भी साथ नहीं देती है। आपातकाल के दौरान पुलिस यातना को सुनाते हुए लोकतंत्र सेनानी गोंविद दादवानी आज भी सिंहर उठते हैं।
मीसा में इस तरह हुई गिरफ्तारी
15 महीने केन्द्रीय जेल भोपाल में मीसाबंदी रहे 78 साल के श्री दादवानी बताते हैं-‘ उस समय मेरी उम्र 18 वर्ष थी। 27 दिसम्बर 1975 को भोपाल रेलवे स्टेशन के बाहर तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चन्द्र सेठी की सभा थी। पदाधिकारियों का आदेश हुआ कि उनकी ओर से हरी झंडी मिलते ही मुख्यमंत्री की सभा में सरकार और मीसा के विरोध में नारे लगाने हैं और पर्चे वितरित करने हैं। मैंने तीन अन्य साथियों अरुण परणीतकर, दिलीप गोलवलकर, ईश्वर तोलानी के साथ नारेबाजी शुरू कर दी। पर्चे भी उछाल दिए। पुलिस गिरफ्तार कर थाने ले गई और कपड़े उतारकर ठंडे बरसाए।
पदाधिकारी रखते थे हमारा ख्याल
दादवानी बताते हैं कि मीसा में उनके साथ भोपाल जेल में बाबूलाल गौर, आरिफ अकील, हस्मत बारसी, आरिफ बेग, शिवराज सिंह चौहान जैसे कई बड़े नेता था। पदाधिकारी हमारा खयाल भी रखते थे और हमें धीरज भी बंधाते थे। पदाधिकारियों ने जेल में संरक्षक की तरह हमें कोई परेशानी नहीं होने दी।
हर समय रहता पुलिस और सीआईडी का पहरा
आपातकाल के विरोध करने वाले उस समय सरकार के लिए सबसे बड़े अपराधी थे। पुलिस से लेकर सीआईडी तक आपातकाल के आंदोलनकारियों को खोजती घूमती थी। संघ परिवार के लोगों को खोजने पुलिस पदाधिकारियों से लेकर कार्यकर्ताओं के घरों तक पूछताछ और तलाशी करती रहती थी।
माँ को भरोसा था जेल से जरूर छूटूंगा
मेरी गिरफ्तारी के दौरान माँ दीदी के घर मुंबई में थीं। लौटने पर उन्हें पता चला। मैं घर में सबसे छोटा था, इसलिए वे दुखी और परेशान थीं। उनके कहने पर मैंने पैरोल का आवेदन लगाया। 15 दिन का पैरोल पर माँ के साथ रहा। माँ के आदेश पर फिर से आवेदन लगाया लेकिन कलेक्टर ने पेरोल नहीं बढ़ाई। फिर से जेल गया और आपातकाल की समाप्ति पर ही छूटा। किसी को अनुमान नहीं था कि आपातकाल कब खत्म होगा? हालांकि माँ को भरोसा था कि मैं जल्द ही जेल से छूटकर उनके पास पहुंचूंगा।
कॉलेज में नहीं मिल सका प्रवेश
आपातकाल के समय 11वीं में था। जेल में रहते हुए सभी मीसाबंदियों का दैनिक कार्यक्रम पूरी तरह संयमित और व्यवस्थित रहा। जेल में शाखा भी लगी और भजन-कीर्तन, पूजा पाठ भी जारी रहा। राघव जी (पूर्व मंत्री) ने जेल में ही एकाउंटेंसी की कक्षाएं लीं। जेल से छूटने के बाद नियमित परीक्षा नहीं दे सका। एक विषय में पूरक आई। परीक्षा देकर उत्तीण हुआ, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी हमीदिया कॉलेज में प्रवेश नहंी मिल सका।
दुकान से पलता था परिवार, आपातकाल में बिगडे हालात
मैं स्वयं तो कुछ नहीं करता था, घर की आर्थिक स्थिति भी ठीकठाक थी। लेकिन मीसाबंदी होने के चलते पुलिस परिजनों को परेशान करती थी। जिससे धंधा कम होता चला गया। दुकान से 8 बहनों और 4 भाईयों वाले परिवार का भरण-पोषण होता था, जिसे भाई लालंद दादवानी चलाते थे। परेशानी में भी उन्होंने होंसला नहीं छोड़ा और कहा कि दुकान बेच दो और पैसा परिवार को खर्च के लिए दे दो।
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