आध्यात्म

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आत्मस्वरूप में स्थित होना ही ज्ञान है: माँ पूर्णप्रज्ञा

आध्यात्म

-शंकर व्याख्यानमाला के तहत अजातवाद पर दिया उद्बोधन

-कहा, जीव, जगत और ईश्वर का ऐक्य ही है अद्वैत वेदांत

भोपाल। आत्मस्वरूप में स्थित होना ही ज्ञान है। अजातवाद विषय पर यह कहना है अखंड बोध आश्रम ऋषिकेश की आचार्या श्री श्री माँ पूर्णप्रज्ञा का। वह शंकर व्याख्यानमाला के 81वें मासिक व्याख्यान में बोल रही थी। रविवार यह ऑनलाइन कार्यक्रम आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित था। 

       जहां उन्होंने बताया कि उपनिषदों का मूल विषय ब्रह्मविद्या है अर्थात् ब्रह्म को ज्यों का त्यों जानना। इसी उपनिषदिक ज्ञान को वेदांत भी कहते हैं। अजातवाद प्रमुखरूप से आदि शंकराचार्य के दादागुरु गौड़पादाचार्य द्वारा माण्डूक्यकारिका नामक ग्रंथ में प्रतिपादित हुआ। उन्होंने कहा कि सभी जीवन में सुख खोजते हैं। पहले भैतिक सुख, फिर सूक्ष्म धर्म सुख, फिर ईश्वर प्रेम सुख, फिर समाधि सुख। किंतु इन सबमें मैं का भाव बना रहता है। इसलिए पूर्णसुख प्राप्ति नहीं होती। क्योंकि कर्म में कर्ता और उपासना में उपास्य यानी दोनों में मैं का प्राथक्य बना रहता है। इसलिये वेदांत की आवश्यकता होती है। यह इस मैं की परिच्छिन्नता को काटता है और ब्रह्मबोध कराता है।

बताई ब्रह्म की विशेषता

ब्रह्म अनित्य में नित्य है, जड़ में चेतन है, सद्वय में अद्वय है, परिच्छिन्न में परिपूर्ण है, परिवर्तन में अपरिवर्तांशी है और अमर है। ऐसे ब्रह्म को कैसे जाना जाए? इंद्रियों अथवा अंत:करण से यह संभव नहीं होता मैं का ज्ञातापना आ जाता है। यानि ज्ञाता और ज्ञेय की बीच की परिच्छिन्न वृत्ति को ही ज्ञान समझ लेते हैं। सत्य को न जानने से ही सभी दुख होते हैं। सत्य तक न पहुँच पाने के प्रमुख कारण स्त्री, धन और वासनावान पुरुषों का संग है। आत्म-अनात्म विवेक से आती है चैतन्यता। इसलिए सत्संग आवश्यक है। इससे ज्ञात होगा कि सत्य स्वयंभू है और चेतन स्वयंप्रकाश है।

ब्रह्मबोध जीव का अंतिम लक्ष्य 

मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मस्वरूप को जानना यानि ब्रह्मबोध करना है। माया के कारण हम अपने मूल स्वरूप को नहीं पहचान पाते। आई अज्ञान से अहंकार का जन्म होता है। अत: हमें ज्ञान से माया के पार जाकर आत्मरूप में स्थित होना है। उन्होंने कहा कि चार्वाक दर्शन के अनुसार पहले स्थूल शरीर बनता है फिर उसमें सूक्ष्म शरीर विकसित होता है। बौद्ध दर्शन का मत है कि पहले सूक्ष्म शरीर होता है फिर स्थूल शरीर बनता है। जैन मत के अनुसार दोनों शरीर पूर्णत: भिन्न हैं। वेदांत के अनुसार स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीर तीनों ही कल्पित हैं यानि अध्यारोप है।