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Hidden picture'' gossip गुगली: मेट्रो की पटरी पर फिर फिसल गया मामा,परिवहन की कुर्सी पर फिर से कोशिश में तोंदू साहब
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Gossip गुगली: एमपी के जगजाहिर मामा ने दो दशक तक सूबे की सूबेदारी करी है, लेकिन मन नाय भर सको। सूबे का मुखिया रहते मामा के चलाए कई जुबानी तीर तो आज भी उड़ते देखे जा सकते है। लेकिन निशाना ठीक नहीं बैठ रिया है। मामा का दशक पुराना सपना था राजधानी की मेटरो तो में ही चलाऊंगा। लेकिन मेट- रो की पटरी पर मामा की किस्मत ऐसी फिसली कै न तो मामा मेटरो के पिलर की जमीन खोद पाया, न ही पहले से सिलवाकर रखी हरे रंग की झंडी को मेटरो के आगे लहरा पाया। पहले मामा का 18 वाला कॉन्फिडेंस ले मारा था और नाथ ने खुद की कुर्सी में कील ठुकने से पहले ही हाथों हाथ पिलर काजे गैंती जमीन में ठोक डाली। जब झंडी लहराने का टेम आया तो संघटन मामा की कुरसी पर मोहन को बैठा दिया। वैसे मामा से चार कदम चलने वाली उसकी खोपड़ी का कोई तोड़ नहीं है। 23 के इलेक्शन के पहले मामा को खुटका था, सो अधबिछी पटरी पर ही मेटरो दौड़ा और उसमें सवारी कर राजधानी की इस मेट्रो के भावी इतिहास के पन्नों पर मामा स्याही तो पहले ही फैला चुका है। मोहन तो आज से हम शहर वालों को मेटरो का सफर कराएगा, मामा ने तो स्मार्ट पारक में ही तीन साल पेले मेटरो दौड़ा दी थी । वैसे मामा ने अपनी कोशिशों में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी है। पान के शौकीन राजधानी वासियों को समझ नहीं आ रिया है, कि मामा की किस्मत मेटरो की पटरी पे फिसली या खुद मामा ही फिसल गिया है।
परिवहन की कुर्सी पर फिर से कोशिश में तोंदू साहब
खाकी वर्दी वाले कई बड़े साहब वाहन चालक की कुर्सी के लिए पर्याप्त कसरत कर रहे हैं। इन दिनों दो साहिबों के नामों पर चर्चा गरम है। एक मुखिया की बिरादरी वाले, फ़िटफाट संतोष हैं, गवालियर-चंबल एक दशक बाद भी जिनके एनकाउंटर को याद करते है। वैसे इंदौर वासी भी साहब को लम्बी दौड़ का ही कहते है। मतलब अब समझ आ रहा है। सीट की दौड़ में दूसरा नाम एमपी में सबसे बड़ी तोंद वाले साहिबों में शामिल हैं। वे 14 महीने पहले ही तो क्लीनर वाली कुर्सी से फिसलकर महाकाल की नगरी में जा गिरे थे। मुखिया के शहर की गुदगुदी कुर्सी पर भी साहब को आनंद नहीं आ रिया है। साहब को हर दिन सड़क पर दौड़ते ओवरलोड ट्रकों के सपने आ रहे है। महाकाल की नगरी से पड़ोसी सूबे की ओर दौड़ते 12 और 18 चक्कों की ओर वे आशा भरी निगाहों से ताकते देखे जा सकते हैं । वाहन में सवारी के लिए साहब संगठन से सिफारिश और मुखिया के परिवार की चापलूसी में जुटे हैं। उनका यह सपना पूरा होगा अथवा नहीं, यह तो महाकाल ही जानें, लेकिन इस बात का आभाष उन्हें भी है कि मुखिया की विरादरी सब पर भारी, संतोष फिर से उनकी जुगाड़ नहीं लगने देंगे। हालांकि मुखिया का विश्वास जीत चुके विवेक को अभी सीट से हटाना इतना भी आसान नहीं है।
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